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जालंधर में बड़े एक्शन की तैयारी! विजिलेंस ने स्मार्ट सिटी के घोटालों पर जांच की तेज

जालंधर: स्मार्ट सिटी जालंधर से जुड़े घोटालों की जांच अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई लगती है। पता चला है कि स्टेट विजिलेंस ब्यूरो के जालंधर यूनिट ने जांच की रफ्तार तेज करते हुए कई पूर्व अधिकारियों, ठेकेदारों और प्रोजेक्ट से जुड़े कर्मियों के बयान दर्ज कर लिए हैं। बताया जा रहा है कि विजिलेंस ने अब तक उन सभी अधिकारियों का पूरा डेटा जुटा लिया है जिन्होंने स्मार्ट सिटी प्रोजेक्टों को तैयार किया, टैंडर पास किए, काम करवाए और भुगतान की मंजूरी दी। आने वाले दिनों में इन अफसरों को जवाबदेह बनाकर उनके विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है। कुछ मामलों में सरकारी पैंशन तक रोके जाने की संभावना जताई जा रही है।

जानकारी के अनुसार, विजिलेंस ब्यूरो ने उन सभी प्रोजेक्टों की जांच को प्राथमिकता दी है जिन पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। इनमें एल.ई.डी. स्ट्रीट लाइट प्रोजेक्ट, बिस्त दोआब नहर सौंदर्यीकरण प्रोजेक्ट और स्मार्ट रोड प्रोजेक्ट प्रमुख हैं। इन योजनाओं पर करोड़ों रुपए खर्च हुए लेकिन जमीनी स्तर पर इनका लाभ जनता को नहीं मिला। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत करीब 900 करोड़ रुपए से अधिक की राशि जालंधर के विकास कार्यों पर खर्च की गई थी परंतु शहर की हालत देखकर स्पष्ट है कि प्रोजेक्टों से अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। कैग की ऑडिट रिपोर्ट ने भी इन प्रोजेक्टों में गंभीर वित्तीय गड़बड़ियां उजागर की हैं, जिसके बाद विजिलेंस ने जांच का दायरा और बढ़ा दिया है।

स्मार्ट सिटी में रहे अफसरों पर कसेगा शिकंजा

सूत्रों के अनुसार, विजिलेंस उन अफसरों की सूची तैयार कर चुकी है जो स्मार्ट सिटी में साइट इंजीनियर, कंसल्टेंट, प्रोजेक्ट एक्सपर्ट, टीम लीडर और सीईओ स्तर पर कार्यरत थे। यह अफसर प्रोजेक्ट मंजूरी, टेंडरिंग और पेमैंट प्रक्रियाओं से सीधे जुड़े थे। इनमें से कुछ अधिकारी अब रिटायर होकर पैंशन प्राप्त कर रहे हैं। माना जा रहा है कि यदि जांच में दोष सिद्ध हुआ तो सरकार गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई भी कर सकती है।

पारदर्शिता की कमी रही, मर्जी से स्टाफ भर्ती किया

स्मार्ट सिटी जालंधर में कभी पारदर्शिता नहीं रही। न तो प्रोजेक्टों से जुड़ी जानकारी वैबसाइट पर डाली गई और न ही आर.टी.आई. के जवाब दिए गए। यहां तक कि किसी भी प्रोजेक्ट पर प्रैस कॉन्फ्रैंस तक नहीं की गई। इसी कारण स्मार्ट सिटी कम्पनी को एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की तरह काम करने वाला कॉर्पोरेट अदारा तक कहा जाने लगा था।

स्मार्ट सिटी के कई पदों पर आऊटसोर्स एजैंसियों के माध्यम से मनचाहे कर्मचारियों को रखा गया। इनमें से कई नगर निगम के सेवानिवृत्त अधिकारी थे, जो पैंशन लेते हुए दोहरी कमाई कर रहे थे। अब विजिलेंस यह जांच कर रही है कि इन नियुक्तियों के पीछे किन अफसरों की भूमिका थी और किसे अनुचित लाभ पहुंचाया गया।

विजिलेंस ब्यूरो वित्तीय गड़बड़ियों से आगे बढ़कर उन संपत्तियों और प्रॉपर्टियों की भी जांच करने की तैयारी में है जो कथित तौर पर भ्रष्टाचार के पैसों से अर्जित की गईं। बताया जा रहा है कि ब्यूरो ने इस संबंध में प्रारंभिक जानकारी जुटा ली है और जल्द कुछ अधिकारियों की संपत्ति जांच शुरू हो सकती है।

फिलहाल केवल वित्तीय अनियमितता उजागर

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्टों को लेकर हुई कैग की जांच के बाद आई रिपोर्ट और विजिलेंस की जांच केवल वित्तीय अनियमितताओं पर केंद्रित है, जबकि तकनीकी मूल्यांकन (टैक्निकल इवैल्यूएशन) अभी बाकी है। विजिलेंस टीम जल्द ही प्रोजेक्ट साइटों पर जाकर मौके की जांच करेगी ताकि कार्यों की वास्तविक क्वालिटी और घटिया निर्माण की सच्चाई सामने आ सके।

अगर जांच निष्पक्ष रही तो यह संभावना है कि न केवल स्थानीय बल्कि चंडीगढ़ बैठे वरिष्ठ अधिकारी भी इसके घेरे में आ सकते हैं। कुल मिलाकर जालंधर स्मार्ट सिटी के नाम पर हुए करोड़ों रुपए के घोटाले अब विजिलेंस के राडार पर हैं। अफसरों से लेकर ठेकेदारों तक सबकी जवाबदेही तय होगी और इस बार कार्रवाई केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहने वाली, ऐसा माना जा रहा है।