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आईपी एड्रेस खुला तो वोट चोर भी सामने आयेंगे

आधुनिक इंटरनेट में दरअसल कुछ भी गोपनीय नहीं होता

  • सिर्फ ठिकाना नहीं उपकरण भी बताता हैं

  • सीम कार्डों का मामला सामने आ चुका है

  • इसका तार कहां से जुड़े हैं यह बड़ा मामला

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः आज के दौर के इंटरनेट अथवा ईमेल को लेकर आम धारणा ही गलत है। दरअसल यह कुछ भी गोपनीय नहीं होता और ईमेल के गोपनीय होने का भ्रम आम उपयोगकर्ता पालते रहते हैं। लिहाजा वोट चोरी मामले के जांच की गाड़ी जिस तरफ बढ़ रही है, उसमें असली वोट चोरों तक पहुंचा जा सकता है। यह मामला हर आईपी एड्रेस के जियोलोकेशन से जुड़ा होता है।

यानी यह पता किया जा सकता है कि किसी भी इंटरनेट वाले उपकरण का प्रयोग दरअसल किस स्थान से किया गया है। चाहे आईपी एड्रेस स्टैटिक (स्थायी) हो या डायनामिक (बदलने वाला), दोनों ही तरह के एड्रेस का स्थान पता करने का तरीका लगभग एक जैसा ही होता है।

जियोलोकेशन का काम मुख्य रूप से आईपी-टू-लोकेशन डेटाबेस पर निर्भर करता है। आईपी ब्लॉकों का आवंटन: दुनिया भर में, इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स को आईपी एड्रेस के बड़े-बड़े ब्लॉक दिए जाते हैं। आईएसपी फिर इन ब्लॉक्स को अपने ग्राहकों को आवंटित करते हैं।

आईपी जियोलोकेशन सेवाएँ (जैसे कुछ ऑनलाइन टूल) इन आईपी ब्लॉकों को उनके भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ती हैं। यह डेटा विभिन्न सार्वजनिक रिकॉर्ड, जैसे कि क्षेत्रीय इंटरनेट रजिस्ट्री (आरआईआर) के रिकॉर्ड और आईएसपी की जानकारी से इकट्ठा किया जाता है। सटीकता को बेहतर बनाने के लिए, ये सेवाएँ अतिरिक्त तकनीकों का भी उपयोग करती हैं।

यह जानने के लिए कि डेटा पैकेट कहाँ से आ रहे हैं और कहाँ जा रहे हैं, नेटवर्क में राउटर्स के बीच की दूरी को मापा जाता है। लेटेंसी मापन अलग-अलग वैश्विक स्थानों से आईपी एड्रेस तक पहुंचने में लगने वाले समय (विलंबता) को मापकर स्थान का अनुमान लगाया जाता है। कुछ मामलों में, यदि उपयोगकर्ता अनुमति देता है, तो अधिक सटीक स्थान के लिए जीपीएस या वाई फाई डेटा को भी आईपी एड्रेस से जोड़ा जाता है। जियोलोकेशन की प्रक्रिया इन दोनों प्रकार के आईपी के लिए समान रहती है, लेकिन सटीकता में थोड़ा अंतर आ सकता है:

स्टैटिक आईपी एक स्थायी पता होता है जो नहीं बदलता। इसलिए, डेटाबेस में इसकी भौगोलिक जानकारी अधिक स्थिर और आमतौर पर सबसे सटीक होती है। डायनामिक आईपी एक अस्थायी पता होता है जो राउटर रीबूट करने या कुछ समय बाद बदल जाता है।

हालाँकि, यह हमेशा आईएसपी के उसी भौगोलिक क्षेत्र के आईपी एड्रेस के पूल से आता है। इसलिए, जियोलोकेशन इसका अनुमानित स्थान (जैसे शहर या क्षेत्र) बता सकता है, लेकिन यह स्टैटिक आईपी जितना सटीक नहीं हो सकता।

जहां तक पोर्ट नंबर का ज़िक्र है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि पोर्ट नंबर का उपयोग जियोलोकेशन के लिए नहीं किया जाता है। आईपी एड्रेस उस डिवाइस की पहचान करता है जो इंटरनेट से जुड़ा है और यही भौगोलिक स्थान बताता है। पोर्ट नंबर उस डिवाइस पर चल रही किसी विशिष्ट सेवा या एप्लीकेशन की पहचान करता है।

संक्षेप में, आईपी जियोलोकेशन एक आईपी एड्रेस को उसके आईएसपी द्वारा बनाए गए रिकॉर्ड के आधार पर एक भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ने की एक प्रक्रिया है। यह स्टैटिक और डायनामिक दोनों तरह के आईपी एड्रेस के साथ काम करती है, लेकिन पोर्ट नंबर इसमें कोई भूमिका नहीं निभाता। इसलिए वोट चोरी मामले की अगर गहन जांच हुई तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह सारा खेल कहां से और किन लोगों के द्वारा किया गया था। यह भी राज खुल जाएगा कि इस गोरखधंधे में किस किस्म के साफ्टवेयर का प्रयोग किया गया था।