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यहां देवी श्याम वर्ण में स्थापित हैं

पुरुलिया का देउलघाटा को लोग सबसे प्राचीन दुर्गा पूजा मानते हैं

  • नदी के तट पर बना है यह मंदिर

  • पुराना मंदिर दो हजार साल पुराना

  • हजारों पर्यटक इसे देखने आते रहते हैं

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः पश्चिम बंगाल का पुरुलिया जिला न केवल अपनी लाल मिट्टी की सड़कों, हरे-भरे जंगलों और विश्व प्रसिद्ध छऊ नृत्य के लिए जाना जाता है, बल्कि यह भारतीय परंपरा और संस्कृति की एक अद्भुत धरोहर भी संजोए हुए है। कम ही लोग जानते हैं कि भारत की संभवतः सबसे प्राचीन दुर्गा प्रतिमा इसी ऐतिहासिक भूमि, विशेष रूप से देउलघाटा क्षेत्र में स्थित है। पुरुलिया शहर से लगभग 27 किलोमीटर दूर, कंगसाबती नदी के शांत तट पर बसा यह देउलघाटा, सदियों पुराने एक रहस्य को अपने भीतर समेटे हुए है।

जंगलों से घिरे इस सुरम्य स्थल पर लगभग दो हज़ार साल पुराना एक मंदिर विद्यमान है, जहाँ देवी दुर्गा विराजमान हैं। यह मंदिर पकी हुई मिट्टी से निर्मित है और इसकी स्थापत्य शैली इसे असाधारण बनाती है। मंदिर की संरचना बौद्ध मंदिर शैली से प्रेरित लगती है, जो इसके प्राचीन मूल की ओर इशारा करती है।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण पाल वंश के शासनकाल के दौरान हुआ था, जो इस क्षेत्र के समृद्ध अतीत की गवाही देता है। मंदिर पर उकेरी गई असाधारण पत्थर की मूर्तियाँ और इसका त्रिभुजाकार द्वार एक गौरवशाली इतिहास की कहानी कहते प्रतीत होते हैं, जो इसे एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल बनाते हैं।

इस मंदिर में स्थापित माँ दुर्गा की प्रतिमा साधारण देवी प्रतिमाओं से बिल्कुल अलग है और कई मायनों में अद्वितीय है। सबसे बड़ा आश्चर्य तो देवी का श्याम वर्ण (काला रंग) है, जो आमतौर पर देखी जाने वाली सुनहरे रंग की दुर्गा प्रतिमाओं से भिन्न है। इसके अलावा, पारंपरिक प्रतिमाओं में देवी का बायाँ पैर महिषासुर रूपी भैंसे पर होता है, लेकिन यहाँ की प्रतिमा में देवी का दायाँ पैर भैंसे पर रखा हुआ है।

देवी की मूर्ति के शीर्ष पर एक चक्र स्तंभ है और उनके चरणों के पास परियों की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं। माता के दोनों ओर देवी के आठ रूप भी दर्शाए गए हैं, जो उनकी शक्ति के विभिन्न आयामों को प्रकट करते हैं।

स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, आरंभ में यह प्रतिमा एक वृक्ष के नीचे खुली हवा में स्थापित थी और वहीं उनकी पूजा-अर्चना की जाती थी। जब यह महसूस किया गया कि धूप और पानी के कारण मूर्ति क्षतिग्रस्त हो रही है, तब इसे सुरक्षित रखने के उद्देश्य से इस प्राचीन मंदिर के अंदर विधि-विधान के साथ स्थापित किया गया।

आज भी, इस मंदिर में प्रतिदिन नियमानुसार पूजा-अर्चना की जाती है, जो इसकी अटूट परंपरा को दर्शाता है। दुर्गा पूजा के चार दिनों के लिए यहाँ विशेष व्यवस्था होती है और उत्सव का माहौल रहता है। प्राचीन परंपरा के अनुसार, पूजा की शुरुआत महालया के दिन चंडी पाठ के साथ होती है। इस पूजा की एक और विशिष्टता बलि की प्रथा है, जो आज भी जारी है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन बकरे की बलि देने की परंपरा निभाई जाती है।

भारत की इस सबसे प्राचीन दुर्गा पूजा के दर्शन करने और इस अनूठी परंपरा का अनुभव लेने के लिए न केवल देश के विभिन्न हिस्सों से, बल्कि दूसरे देशों से भी श्रद्धालु और पर्यटक बड़ी संख्या में पुरुलिया के देउलघाटा में इकट्ठा होते हैं। यह स्थान सिर्फ एक मंदिर नहीं है, बल्कि भारतीय इतिहास, धर्म और सांस्कृतिक विविधता का एक जीवंत प्रमाण है।