बिहार के एसआईआर पर चुनाव आयोग की दलीलें नामंजूर
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आयोग की तरफ से ग्यारह दस्तावेज थे
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कई पक्षों में याचिका दायर किया था
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अगली सुनवाई आगामी 15 सितंबर को
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी किया है। शीर्ष अदालत ने भारत के चुनाव आयोग को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह चुनावी राज्य बिहार में मतदाताओं की पहचान और निवास के प्रमाण के रूप में आधार कार्ड को एक वैध दस्तावेज़ के तौर पर स्वीकार करे। इस फैसले से अब आधार, पासपोर्ट और जन्म प्रमाण पत्र सहित 11 अन्य स्वीकार्य दस्तावेजों की सूची में शामिल हो जाएगा।
नागरिकता और पहचान का स्पष्ट अंतर न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस आदेश के साथ ही एक अहम बात साफ की है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि आधार केवल पहचान और निवास का प्रमाण होगा, न कि नागरिकता का प्रमाण। चुनाव आयोग को यह अधिकार होगा कि वह अन्य सभी दस्तावेजों की तरह ही जमा किए गए आधार की प्रामाणिकता और वास्तविकता की पुष्टि कर सके।
यह अंतरिम आदेश तब आया जब राष्ट्रीय जनता दल (राजद), एआईएमआईएम और अन्य राजनीतिक दलों की याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी। इन याचिकाकर्ताओं ने चुनाव आयोग के उस तर्क पर आपत्ति जताई थी कि जब 11 में से अधिकांश दस्तावेज़ नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं, तो आधार को क्यों बाहर रखा गया है।
चुनाव आयोग का पक्ष और तर्क सुनवाई के दौरान, चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए राकेश द्विवेदी ने तर्क दिया कि मसौदा मतदाता सूची में शामिल 7.24 करोड़ मतदाताओं में से 99.5 प्रतिशत ने पहले ही एसआईआर प्रक्रिया में अपने दस्तावेज़ जमा कर दिए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी राजनीतिक दल ने किसी बड़ी त्रुटि की शिकायत नहीं की है।
द्विवेदी ने इस बात पर जोर दिया कि आधार को पासपोर्ट के बराबर दर्जा नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पासपोर्ट नागरिकता का भी प्रमाण होता है, जबकि आधार नहीं। यही कारण है कि चुनाव आयोग इसे अन्य 11 दस्तावेज़ों के बराबर शामिल करने पर आपत्ति कर रहा था।
इसके जवाब में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि जब खुद फॉर्म 6 आधार को स्वीकार करता है, तो उसे 12वें दस्तावेज़ के रूप में क्यों नहीं जोड़ा गया?
पैरालीगल स्वयंसेवकों का मुद्दा सुनवाई में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठा, वह था पैरालीगल स्वयंसेवकों की नियुक्ति का। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले आदेश में बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष को हर जिले में ऐसे स्वयंसेवकों को सक्रिय करने का निर्देश दिया था, ताकि वे व्यक्तियों और राजनीतिक दलों को दावे, आपत्तियाँ और सुधार प्रस्तुत करने में मदद कर सकें।
हालाँकि, गोपाल शंकरनारायणन ने कोर्ट को सूचित किया कि अभी तक इन स्वयंसेवकों की नियुक्ति नहीं की गई है। इस पर राकेश द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि उनकी नियुक्ति करना चुनाव आयोग का काम नहीं है।
अगली सुनवाई 15 सितंबर को कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी निर्देश दिया कि इस फैसले का व्यापक प्रचार किया जाए। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने चुनाव आयोग से इस आदेश को अपनी वेबसाइट पर तुरंत डालने को कहा। इस मामले की अगली सुनवाई अब 15 सितंबर को होगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बिहार के मतदाताओं के लिए एक बड़ी राहत है, क्योंकि अब उनके पास मतदाता सूची में अपने नाम को सत्यापित कराने के लिए एक और सुविधाजनक विकल्प उपलब्ध हो गया है। साथ ही, यह फैसला पहचान और नागरिकता के बीच के अंतर को स्पष्ट करने में भी सहायक है।