Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Himanshu Bhau Gang Shooters Arrested: हिमांशु भाऊ गैंग के दो शार्प शूटर गिरफ्तार, दिल्ली पुलिस को मह... Jewar Airport Inauguration Time: जेवर एयरपोर्ट का उद्घाटन आज, जानें कितने बजे शुरू होगा समारोह और क्... Nashik Ashok Kharat Case: नासिक के भोंदू बाबा अशोक खरात पर 2 नई FIR, अब तक 10 मामले दर्ज; अंतरराष्ट्... Weather Update Today: दिल्ली-NCR में झमाझम बारिश से राहत, यूपी और बिहार में धूल भरी आंधी का अलर्ट; प... बिहार के लिए बड़ी खुशखबरी! रेलवे ने दी 3 नई ट्रेनों की सौगात, कल से शुरू होंगी नाइट फ्लाइट्स Moradabad Conversion Case: मुरादाबाद में छात्रा पर जबरन धर्म परिवर्तन का दबाव, बुर्का पहनाने और नॉनव... Ghazipur Rape Case Update: गाजीपुर में सिस्टम की संवेदनहीनता, 6 साल की रेप पीड़िता 15 घंटे तक इलाज क... सुसाइड नोट में लिखा खौफनाक सच: शादी के महज 15 दिन बाद दुल्हन ने दी जान, आखिरी खत में लिखी ऐसी बात कि... Petrol Tanker Accident: पेट्रोल टैंकर और ट्रक की भीषण भिड़ंत, सड़क पर बहने लगा हजारों लीटर तेल, मची ... UP Fuel Supply Update: यूपी में ईंधन संकट की अफवाह! पंपों पर उमड़ी भीड़, 24 घंटे में रिकॉर्ड तोड़ बि...

राहुल का भय तो पत्रकारों से नाराजगी

द वायर के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन को लेकर असम पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई और उसके बाद के कानूनी घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता और असंतोष के अधिकार पर चल रहे संघर्ष को उजागर करते हैं। यह मामला, जिसमें राजद्रोह जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल किया गया था, पत्रकारों के खिलाफ राज्य मशीनरी के दुरुपयोग और सरकार की आलोचना को दबाने के प्रयासों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

वैसे इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले में दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है। यह पूरा मामला द वायर द्वारा प्रकाशित ऑपरेशन सिंदूर नामक एक लेख से शुरू हुआ। इस लेख में इंडोनेशिया में भारत के सैन्य अताशे के कुछ बयानों का उल्लेख किया गया था, जिसमें भारतीय वायुसेना के विमानों और सैन्य रणनीति पर टिप्पणियां थीं।

असम पुलिस ने इस लेख को भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाला मानते हुए राजद्रोह का मामला दर्ज किया। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि पुलिस ने एक ही घटना के लिए असम के अलग-अलग जिलों में दो अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की।

जब सर्वोच्च न्यायालय ने 12 अगस्त को वरदराजन के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाने का निर्देश दिया, तो असम पुलिस ने इस आदेश की अवहेलना करते हुए एक दूसरे जिले में नई प्राथमिकी दर्ज कर दी। यह कार्रवाई न केवल न्यायपालिका के आदेशों की अवमानना थी, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे राज्य एजेंसियां कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करके व्यक्तियों को परेशान कर सकती हैं।

राजद्रोह कानून, भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए, लंबे समय से बहस का विषय रहा है। इसकी अस्पष्ट परिभाषा और औपनिवेशिक काल के अवशेष होने के कारण, इसे अक्सर सरकार की आलोचना को दबाने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य (1962) फैसले में इस कानून की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण शर्त जोड़ी थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल सरकार की आलोचना करना राजद्रोह नहीं है।

राजद्रोह का अपराध तब ही बनता है, जब किसी व्यक्ति के कार्य या शब्द सीधे तौर पर हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था को भड़काते हों। यह फैसला भारतीय लोकतंत्र में असहमति के अधिकार की नींव रखता है। मई 2022 में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए धारा 124ए के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी।

न्यायालय ने कहा था कि इस कानून की कठोरता वर्तमान सामाजिक परिवेश के अनुरूप नहीं है। न्यायालय ने केंद्र सरकार को इस कानून की समीक्षा करने का समय दिया और यह उम्मीद और अपेक्षा भी व्यक्त की कि सरकार इस प्रावधान का इस्तेमाल करके कोई भी नई प्राथमिकी दर्ज करने, जाँच जारी रखने या कोई दंडात्मक कार्रवाई करने से बचेगी।

न्यायालय के इस रुख के बावजूद, राजद्रोह के मामले जारी रहे, जिसमें वरदराजन का मामला एक प्रमुख उदाहरण है। सरकार ने 2023 में जब भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) पेश की, तो राजद्रोह कानून को खत्म करने की बात कही। हालाँकि, नए कानून में इसे पूरी तरह से हटाया नहीं गया, बल्कि इसका नाम बदलकर देशद्रोह कर दिया गया।

नई संहिता की धारा 152 में, भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों को परिभाषित किया गया है। आलोचकों का मानना है कि यह नया प्रावधान भी उतना ही अस्पष्ट और दुरुपयोग के लिए खुला है जितना कि पुराना कानून था। नाम में बदलाव से कानूनी प्रावधान का सार नहीं बदला, और इसका निराशाजनक दुरुपयोग जारी है।

वरदराजन का मामला पत्रकारों के खिलाफ चुनिंदा और अनुचित तरीके से राज्य मशीनरी का इस्तेमाल करने का एक स्पष्ट उदाहरण है। एक समाचार रिपोर्ट के लिए राजद्रोह के प्रावधानों को लागू करना, जो पहले से ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित थी, उचित प्रक्रिया का उल्लंघन और भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) जैसे मौलिक अधिकारों का हनन है।

यह घटना दर्शाती है कि कैसे सरकारें असहमति को दबाने के लिए कानूनी प्रक्रिया को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। जब पत्रकारों को अपने काम के लिए राजद्रोह के आरोपों का सामना करना पड़ता है, तो यह प्रेस की स्वतंत्रता को सीधे तौर पर खतरे में डालता है। पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य सत्ता से सवाल पूछना और सार्वजनिक हित में जानकारी देना है।

अगर इस काम के लिए उन्हें जेल का डर दिखाया जाए, तो यह स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को बाधित करता है, जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है। सिद्धार्थ वरदराजन के मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि राजद्रोह कानून, चाहे उसका नाम कुछ भी हो, सरकार के आलोचकों को परेशान करने का एक शक्तिशाली साधन बना हुआ है।