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बेकसूर निकले तो किसका कसूर होगा

भारत के राजनीतिक और संवैधानिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद मुद्दा सामने आया है – प्रस्तावित संविधान (एक सौ तीसवां संशोधन) विधेयक। यह विधेयक प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, और अन्य मंत्रियों को गंभीर आरोपों के तहत 30 दिनों के लिए जेल में रहने पर उनके पदों से हटाने का प्रावधान करता है, भले ही वे दोषी साबित न हुए हों।

इसी तरह के प्रावधान जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक में भी शामिल हैं। इन विधेयकों को जैसे ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में पेश करने की कोशिश की, विपक्ष ने इसका कड़ा और हिंसक विरोध किया, जिससे सदन में अराजकता फैल गई।

विपक्ष का मानना है कि यह विधेयक देश को एक एकदलीय पुलिस राज्य या तानाशाही में बदलने का एक खतरनाक प्रयास है, न कि राजनीति में नैतिक मानकों को ऊपर उठाने का। विपक्ष की मुख्य चिंता इस विधेयक के संभावित दुरुपयोग को लेकर है। उनका तर्क है कि इस कानून का इस्तेमाल किसी भी विपक्षी मुख्यमंत्री को झूठे आरोपों में फंसाकर 30 दिनों के लिए जेल में डालने और फिर उनके पद से हटाने के लिए किया जा सकता है।

यह आरोप बार-बार लगाया गया है कि वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करके विपक्षी-नेतृत्व वाले राज्यों को अस्थिर करने का प्रयास करती रही है। एक वरिष्ठ वकील ने इस विधेयक को संविधान को ही एक हथियार बनाने जैसा बताया है, जो देश के मूलभूत सिद्धांतों पर सीधा हमला है।

यह केवल विपक्षी नेताओं तक सीमित नहीं है; यह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के उन मंत्रियों पर भी लागू हो सकता है जो केंद्रीय नेतृत्व के लिए चुनौती बन सकते हैं। यह आंतरिक राजनीतिक विरोध को दबाने का एक साधन भी बन सकता है। यह विधेयक कई मौलिक कानूनी और संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, जो भारतीय लोकतंत्र की नींव हैं।

भारतीय संविधान शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर आधारित है, जो कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच स्पष्ट विभाजन सुनिश्चित करता है। यह विधेयक कार्यपालिका को ही न्यायाधीश, जूरी और जल्लाद की भूमिका देकर न्यायपालिका की भूमिका को पूरी तरह से समाप्त कर देता है।

यह एक खतरनाक precedent (पूर्व-उदाहरण) स्थापित करता है, जहां राजनीतिक एजेंसियां न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार कर सकती हैं। इस विधेयक का सबसे बड़ा उल्लंघन कानून के शासन के मौलिक सिद्धांत के खिलाफ है, जिसके अनुसार जब तक कोई व्यक्ति दोषी साबित नहीं हो जाता, तब तक उसे निर्दोष माना जाता है।

इस विधेयक के तहत, केवल आरोप मात्र से ही किसी व्यक्ति को उसके पद से हटाया जा सकता है, जो न्याय के इस मूलभूत सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है। यह एक ऐसी स्थिति पैदा करता है जहां आरोप ही सजा बन जाता है। यह विधेयक कानून-व्यवस्था को राज्य के अधिकार क्षेत्र से हटाकर केंद्र को दे देता है। यह निर्वाचित नेताओं के भाग्य का फैसला निर्वाचित एजेंसियों (मंत्रियों) को करने की अनुमति देता है, जो राज्यों की स्वायत्तता और संघीय ढांचे को कमजोर करता है।

यह केंद्र सरकार को राज्यों के मामलों में मनमाने ढंग से हस्तक्षेप करने का अधिकार देता है, जिससे सहकारी संघवाद (cooperative federalism) की भावना को ठेस पहुँचती है। विपक्ष की आशंकाएं निराधार नहीं हैं। केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय जैसी एजेंसियां, जो निष्पक्ष जांच के लिए जानी जाती थीं, अब केंद्र सरकार के पूर्ण नियंत्रण में मानी जाती हैं। इन एजेंसियों का इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया जाता रहा है।

इसके अलावा, कई राज्यों के राज्यपाल, जिन्हें संवैधानिक रूप से अपने-अपने राज्य मंत्रिमंडलों से सलाह लेनी चाहिए, केंद्र के निर्देशों का पालन करते प्रतीत होते हैं। इस संदर्भ में, यह विधेयक और भी खतरनाक हो जाता है क्योंकि यह केंद्रीय एजेंसियों और राज्यपालों के माध्यम से विपक्षी सरकारों को अस्थिर करने का एक नया कानूनी मार्ग प्रशस्त करेगा।

यह विधेयक राजनीतिक नैतिकता को ऊपर उठाने की सरकार की कथित इच्छा का विरोधाभास प्रस्तुत करता है, क्योंकि यह स्वयं संदिग्ध कानूनी और नैतिक तरीकों को अपनाता है। यह दर्शाता है कि एक नेक मकसद (अगर ऐसा था तो) को हासिल करने के लिए भी, लोकतांत्रिक और संवैधानिक सिद्धांतों को ताक पर नहीं रखा जा सकता।

अंततः, इन विधेयकों को 31 सदस्यों वाली एक संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया है। यह समिति अब इन विधेयकों की संवैधानिकता और औचित्य पर विचार करेगी। यह देखना बाकी है कि क्या यह समिति इस मामले पर सद्बुद्धि से विचार करती है और भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों की रक्षा करती है, या फिर यह राजनीतिक दबाव के आगे झुक जाती है। जो सवाल अनुत्तरित है वह यह है कि आरोप लगने की वजह से अगर किसी की कुर्सी गयी औऱ बाद में वह बेकसूर साबित हुआ तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी और सजा किसे मिलेगी।