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मधुमक्खियों की आबादी के संकट को दूर करने का रास्ता मिला, देखें वीडियो

एक पोषक तत्व से पंद्रह गुणा आबादी बढ़ी

  • नया यीस्ट तैयार कर खाने को दिया गया

  • तीन महीने तक नियमित जांच की जाती रही

  • उनकी कॉलोनियों में पंद्रह गुणा बढ़ोत्तरी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः जलवायु परिवर्तन और कृषि में बढ़ती गहनता के कारण मधुमक्खियों के सामने एक बड़ा संकट आ गया है। उनके लिए ज़रूरी फूलों और पराग की उपलब्धता में कमी आ रही है। पराग में पाए जाने वाले कुछ विशेष वसा (लिपिड) जिन्हें स्टेरॉल कहते हैं, मधुमक्खियों के विकास के लिए बेहद ज़रूरी होते हैं। जब प्राकृतिक पराग नहीं मिलता, तो मधुमक्खी पालक अक्सर उन्हें कृत्रिम पराग का विकल्प देते हैं। हालांकि, ये व्यावसायिक विकल्प, जो प्रोटीन, चीनी और तेल से बने होते हैं, उनमें सही स्टेरॉल यौगिकों की कमी होती है, जिससे वे पोषण की दृष्टि से अधूरे रह जाते हैं।

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ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के नेतृत्व में हुए एक नए अध्ययन ने इस समस्या का एक प्रभावी और टिकाऊ समाधान खोज निकाला है। इस शोध में रॉयल बॉटैनिक गार्डन्स केव, ग्रीनविच विश्वविद्यालय और डेनमार्क के तकनीकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक भी शामिल थे। उन्होंने यरोविया लिपोलीटिका नामक यीस्ट को इस तरह से तैयार किया कि वह छह प्रमुख स्टेरॉल का एक सटीक मिश्रण बना सके, जो मधुमक्खियों के लिए आवश्यक हैं। इस स्टेरॉल-युक्त यीस्ट को मधुमक्खियों के भोजन में मिलाकर तीन महीने तक खिलाने का परीक्षण किया गया।

शोध के प्रमुख निष्कर्ष यह निकला कि उनकी कॉलोनियों में 15 गुना वृद्धि हुई और उनमें प्यूपा चरण तक पहुंचने वाले लार्वा की संख्या 15 गुना तक अधिक थी, जबकि जिन कॉलोनियों को सामान्य भोजन दिया गया था, उनमें ऐसी वृद्धि नहीं देखी गई। जिन कॉलोनियों को समृद्ध आहार दिया गया, वे तीन महीने की अवधि के अंत तक भी लार्वा का पालन-पोषण करती रहीं।

इसके विपरीत, जिन कॉलोनियों को स्टेरॉल-रहित भोजन मिला, उन्होंने 90 दिनों के बाद लार्वा का उत्पादन बंद कर दिया। चौंकाने वाली बात यह थी कि स्टेरॉल-युक्त यीस्ट खाने वाली कॉलोनियों के लार्वा में स्टेरॉल का प्रोफाइल बिल्कुल वैसा ही था जैसा प्राकृतिक रूप से पराग इकट्ठा करने वाली कॉलोनियों में पाया जाता है। इससे पता चलता है कि मधुमक्खियां अपने बच्चों को सिर्फ सबसे जैविक रूप से महत्वपूर्ण स्टेरॉल ही देती हैं।

वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर गेराल्डिन राइट (ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के जीव विज्ञान विभाग) ने कहा, हमारा अध्ययन दिखाता है कि हम वास्तविक दुनिया की पारिस्थितिक चुनौतियों को हल करने के लिए सिंथेटिक बायोलॉजी का कैसे उपयोग कर सकते हैं। मधुमक्खियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले अधिकांश पराग स्टेरॉल प्राकृतिक रूप से व्यावसायिक पैमाने पर उपलब्ध नहीं हैं, जिससे पोषण की दृष्टि से पूर्ण भोजन बनाना असंभव हो जाता है।

अध्ययन की प्रमुख लेखिका डॉ एलीनोर मूर (उस समय ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में) ने समझाया कि मधुमक्खियों के लिए इस स्टेरॉल-समृद्ध आहार और पारंपरिक भोजन के बीच का अंतर उतना ही है जितना इंसानों के लिए संतुलित, पूर्ण भोजन और आवश्यक पोषक तत्वों की कमी वाले भोजन के बीच होता है। उन्होंने कहा, प्रेसिजन फर्मेंटेशन का उपयोग करके, हम अब मधुमक्खियों को एक ऐसा विशेष भोजन प्रदान करने में सक्षम हैं जो आणविक स्तर पर भी पूरी तरह से पौष्टिक है।

यह शोध मधुमक्खी पालन उद्योग के लिए एक गेम चेंजर साबित हो सकता है। यह न केवल मधुमक्खियों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाएगा, बल्कि उनकी कॉलोनियों को भी मजबूत करेगा, जिससे परागण और फसल उत्पादन में सुधार होगा।