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डोनाल्ड ट्रंप की नाराजगी अब खुलकर सामने आ गयी

भारत पर लगाया पच्चीस फीसद अतिरिक्त टैरिफ

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर कुल 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की है, जिसमें से 25% टैरिफ रूस से लगातार तेल खरीदने के कारण लगाया गया है। अमेरिका का यह फैसला भारतीय निर्यातकों, खासकर छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए एक बड़ी चुनौती है।

हालांकि, भारत सरकार ने इसे एक अनुचित कदम बताया है और कहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगी। अमेरिका ने यह अतिरिक्त टैरिफ 21 दिन बाद लागू करने का निर्णय लिया है। इस समय का उपयोग भारत और अमेरिका दोनों बातचीत के लिए कर सकते हैं। इस अवधि में भारत के पास कई रणनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक विकल्प मौजूद हैं। वैसे कुछ लोग मानते हैं कि अगर इस बीच रूस और यूक्रेन का युद्धविराम हो जाता है तो यह सब कुछ वैसे ही खत्म हो जाएगा।

वैसे इस समस्या को सुलझाने के लिए कूटनीतिक रास्ते खुले हुए हैं। भारत इस टैरिफ को कम करने या पूरी तरह से खत्म करने के लिए अमेरिका के साथ बातचीत कर सकता है। अमेरिका के कार्यकारी आदेश की धारा 4(सी) के मुताबिक, अगर भारत रूस से तेल आयात कम करता है तो टैरिफ में बदलाव हो सकता है।

भारत विश्व व्यापार संगठन में इस मुद्दे को उठा सकता है और यह तर्क दे सकता है कि अमेरिका का यह कदम भेदभावपूर्ण है और डब्ल्यूटीओ के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। इसके अलावा, भारत जी 20 या ब्रिक्स जैसे मंचों पर भी अन्य देशों का समर्थन जुटा सकता है। भारत अपनी 85 प्रतिशत तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है, जिसमें से 40 फीसद रूस से आता है।

अमेरिका की नाराजगी को कम करने के लिए भारत सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक और नाइजीरिया जैसे देशों से तेल आयात बढ़ा सकता है। हालांकि, इन देशों का तेल रूसी तेल की तुलना में महंगा हो सकता है। भारत रूस के साथ मिलकर रुपये-रूबल भुगतान प्रणाली को मजबूत कर सकता है। यह व्यवस्था अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकती है। भारत दक्षिण अमेरिका (जैसे वेनेजुएला) या अफ्रीका के अन्य देशों से भी तेल आयात के नए स्रोत खोज सकता है।

घरेलू स्तर पर भारत सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देकर अपनी तेल पर निर्भरता को कम कर सकता है। भारत अपने घरेलू तेल और गैस उत्पादन को बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी काम कर सकता है। यह पूरा मामला भारत के राष्ट्रीय हितों और अमेरिकी दबाव के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को दर्शाता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इन 21 दिनों में क्या कदम उठाता है।