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वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम मामले से उठे सवाल

बिहार में विधानसभा चुनाव से परले पत्रकारिता पर बढ़ते दबाव की चिंता

  • एक निष्पक्ष पत्रकार के तौर पर पहचान है

  • बीएलओ ने दायर किया है यह मुकदमा

  • सुशासन बाबू के राज में भी यही हाल

दीपक नौरंगी

भागलपुरः बिहार में वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम के खिलाफ बेगूसराय के बलिया थाना क्षेत्र में दर्ज की गई प्राथमिकी ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर बढ़ते दबाव को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और इसे पत्रकारों को डराने-धमकाने तथा उनकी आवाज दबाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

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अजीत अंजुम पर सरकारी कार्य में बाधा डालने और सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई है। एफआईआर भाग संख्या 16, साहेबपुर कमाल विधानसभा क्षेत्र के बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) मो. अंसारुल हक ने दर्ज करवाई है। बीएलओ ने आरोप लगाया है कि 12 जुलाई की सुबह करीब 9:30 बजे अजीत अंजुम, उनके सहयोगी और कैमरामैन बिना अनुमति बलिया प्रखंड सभागार में घुस आए और उनसे सवाल-जवाब करने लगे।

बीएलओ के अनुसार, अंजुम ने उनसे बूथ पर मतदाताओं की संख्या, फार्म वितरण और वापसी, मुस्लिम मतदाताओं की संख्या, और दस्तावेजों के जमा होने के बारे में पूछा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अंजुम बार-बार इस बात पर जोर दे रहे थे कि मुस्लिम मतदाताओं को परेशान किया जा रहा है, जिसे बीएलओ ने गलत बताया। बीएलओ ने दावा किया कि अजीत अंजुम और उनकी टीम करीब एक घंटे तक वहां मौजूद रही, जिससे सरकारी कामकाज में बाधा हुई। हालांकि, अंजुम के समर्थकों का कहना है कि वे 40 मिनट के भीतर ही अपनी खबर बनाकर लौट गए थे।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सुशासन में भी पत्रकारों पर बेवजह दबाव डालने, डराने-धमकाने, और यहां तक कि झूठे मुकदमों में फंसाने की कोशिशें आम होती जा रही हैं। अतीत में भी बिहार में पत्रकारों की हत्याएं हुई हैं और उन पर बेवजह मामले दर्ज किए गए हैं। अजीत अंजुम जैसे बेदाग छवि वाले पत्रकार, जिनकी पूरे देश में एक अलग पहचान है और जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी बेहतर मानी जाती है, पर इस तरह का आरोप लगना निश्चित रूप से चिंताजनक है।

सत्ता में बैठे लोग और उनके इशारों पर काम करने वाला प्रशासन, पत्रकारों की आवाज दबाने के लिए संगठित साजिशें रच रहे हैं। जब कोई पत्रकार भ्रष्टाचार, कुप्रशासन या जनहित से जुड़े सवाल उठाता है, तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बदले में उत्पीड़न और कानूनी जाल का सामना करना पड़ता है। उनके खिलाफ झूठे केस बनाए जाते हैं ताकि वे चुप हो जाएं या रास्ता बदल लें। यह स्थिति न केवल पत्रकारिता की गरिमा को ठेस पहुंचा रही है, बल्कि लोकतंत्र की नींव को भी कमजोर कर रही है।