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भ्रामक विज्ञापनों पर नकेल कसना जरूरी

हाल के दिनों में फिर से बाबा रामदेव और उनकी कंपनी चर्चा में है। दरअसल देसी आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली कंपनी पतंजलि को भ्रामक विज्ञापनों के लिए सर्वोच्च न्यायालय की नाराजगी का सामना करना पड़ा है। मॉन्डलीज जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी वाणिज्य मंत्रालय के एक आदेश के बाद बाजार संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

उन्हें इसी वजह से एक नहीं दो बार माफी मांगनी पड़ी है। अब बाबा रामदेव की कंपनी पर कार्रवाई हुई तो वाणिज्य मंत्रालय ने अपने आदेश में कहा है कि ई-कॉमर्स कंपनियों को अपने पोर्टल पर सभी पेय पदार्थों को स्वास्थ्यवर्द्धक पेय की श्रेणी में रखना बंद कर देना चाहिए। वैसे बाबा रामदेव के खिलाफ कार्रवाई ने एक वर्ग को नाराज भी कर दिया है।

ऐसे लोग अन्य कंपनियों के बारे में भी यही सवाल उठा रहे हैं। ऐसे विरोध की वजह राजनीतिक सोच भी हो सकती है। हाल के वर्षों में ऑनलाइन विज्ञापनों में ऐसे भ्रामक दावों की बाढ़ सी आ गयी है। फेसबुक पर दिखाये जाने वाले अनेक विज्ञापन सीधे तौर पर स्कैम होते हैं और फेसबुक तक शिकायत के बाद भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती।

परंतु यह घटना उस बढ़ती चिंता की ओर भी इशारा करती है जो स्वास्थ्यवर्द्धक पेशेवरों के मन में उन तमाम खाद्य और पेय पदार्थों के विज्ञापन को लेकर है जो भारत में बच्चों को लक्षित करते हैं। देसी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां यह रणनीति अपनाती हैं। वाणिज्य मंत्रालय ने स्वास्थ्यवर्द्धक पेय को लेकर जो नोटिस जारी किया है उसकी जड़ें एक वर्ष पुराने विवाद से जुड़ी हैं।

उस समय पैकेट बंद खाद्य पदार्थों की समीक्षा करने वाले रेवंत हिम्मतसिंगका नाम के एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ने बॉर्नविटा में बहुत अधिक मात्रा में चीनी होने और उसके बच्चों पर असर होने की बात कही थी। मॉन्डलीज ने उन्हें एक नोटिस भेजकर कहा था कि वह उस वीडियो को डिलीट कर दें। हिम्मतसिंगका के पास एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से लड़ने के लिए संसाधन नहीं थे इसलिए उन्होंने माफी मांग ली।

कंपनी ने भी स्पष्टीकरण जारी करके कहा कि बॉर्नविटा में चीनी की मात्रा दैनिक उपयोग की तय मात्रा से काफी कम है। परंतु वह वीडियो वायरल हो चुका था और एनसीपीसीआर के पास भी इसकी शिकायत पहुंची। उसने कंपनी को निर्देश दिया कि बॉर्नविटा के भ्रामक विज्ञापन, पैकेजिंग और लेबल सभी हटाए जाएं।

बाद में पता चला कि कंपनी के दावों के उलट एनसीपीसीआर ने कहा कि बॉर्नविटा ने माल्टॉडेक्स्ट्रिन और लिक्विड ग्लूकोज जैसे लेबल का इस्तेमाल करके चीनी की सीमा को कम करके दिखाया। एफएसएसएआई के लेबलिंग और डिस्प्ले नियमन 2020 के मुताबिक इन्हें भी चीनी के लेबल के अंतर्गत ही दिखाया जाना चाहिए था।

दिसंबर में कंपनी ने बॉर्नविटा में मिश्रित चीनी की मात्रा को कम कर दिया। एनसीपीसीआर और वाणिज्य मंत्रालय दोनों के कदम असाधारण हैं लेकिन सवाल यह उठता है कि उपभोक्ता कल्याण से जुड़े सार्वजनिक संस्थान पहले क्यों नहीं सक्रिय हुए। स्वास्थ्यवर्द्धक पेय की श्रेणी कई वर्षों से चलन में है लेकिन सरकार को कदम उठाने के लिए एक इन्फ्लुएंसर के अभियान का इंतजार करना पड़ा।

इसके साथ ही सैकड़ों और इन्फ्लुएंसर बिना नियामकीय जांच परख के संदिग्ध खाद्य और पेय पदार्थों की तारीफ करते हैं। दूसरी तरफ हाल के दिनों में अफ्रीका में जहरीला कफ सीरम के मामले में भी भारतीय दवा उद्योग की आलोचना हुई है। अब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पतंजलि आयुर्वेद का जो मामला था वह भी ऐसी ही कमी को उजागर करता है।

इसे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा लाया गया था जब सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार अपनी आंखें बंद करके बैठी है। चूंकि वैकल्पिक दवाओं और पैकेट बंद भोजन का बाजार (खासकर बच्चों पर केंद्रित) तेजी से बढ़ रहा है इसलिए उपभोक्ता कल्याण के लिए अधिक मजबूत निगरानी संस्था की जरूरत है। लेकिन इन तमाम बहसों के बीच भ्रामक विज्ञापनों से जनता को होने वाले नुकसान के प्रति सरकारी और सामाजिक स्तर पर अधिक ध्यान दिये जाने की जरूरत है।

आम जनता ऐसे विज्ञापनों में कही गयी बातों को सही मानकर धोखे में आ जाती है। इस किस्म की ऑनलाइन या ऑफलाइन धोखाघड़ी से जनता को बचाना भी सरकार की जिम्मेदारी है। फिर भी यह सर्वविदित है कि वर्तमान में इनकी निगरानी करने वाली सरकारी संस्थाएं भी अपनी जिम्मेदारी का सही तरीके से पालन नहीं कर रही है।

इसी वजह यह जिम्मेदारी सामाजिक संगठनों पर अधिक है कि वे ऐसे भ्रामक विज्ञापन के दावों का वैज्ञानिक स्तर पर जांच करें और उचित कार्रवाई करें। इस बात को समझना होगा कि लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ही ऑनलाइन विज्ञापन नजर आते हैं। इंटरनेट की दुनिया में हर व्यक्ति की सोच का विश्लेषण कर ही इसे वही चीज दिखलाई जाती है, जो उसकी पसंद का हो। इस पर भी रोक लगाने की जरूरत है।