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दिल का खिलौना हाय टूट .. .. .. ..

दिल का खिलौना किसी एक का नही टूट रहा है। चुनावी दंगल में मौजूद सभी पहलवान एक एक कर अपने खिलौने को टूटते हुए देख रहे हैं। ऊपर वाला भी इंडियन पॉलिटिक्स में नये नये दांव आजमाता है। जिसकी नतीजा है कि रस्सी भी सांप बन जाती है और सांप को भी लोग रस्सी समझदर साइकल की पिछली सीट पर बांधकर रखते हैं। इस बार भी लोकसभा का चुनाव करीब आने के दौर में यही बात बार बार सामने आ रही है। मजेदार बात है कि सभी को इस चुनौती से दो चार होना पड़ रहा है और कोई एक यह दावा भी नहीं कर सकता कि उसके सामने यह चुनौती नहीं है।

सबसे पहले इंडिया गठबंधन की बात कर लें तो कई बार तो ऐसा लगा कि गाड़ी के सभी चक्के खुलकर अलग अलग दौड़ने लगेंगे। किसी तरह मामला पटरी पर आता दिखा तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी फिर से अपने पुराने तेवर में लौट गयी। उन्होंने एक बार फिर से साफ  कर दिया कि वह सभी लोकसभा सीटों पर अकेली लड़ेंगी।

अब यह इंडिया गठबंधन से नाराजगी है अथवा ईडी की कार्रवाई का भय, यह अब तक साफ नहीं हो पाया है। ईडी वाला मामला झारखंड में तो साफ हो गया है क्योंकि किसी मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करने की पहली घटना हुई है। जिस जमीन पर हेमंत सोरेन पर आरोप लगाया गया था, वह जमीन उनके नाम की नहीं है, यह स्पष्ट है। अब ईडी वाले बिजली विभाग से यह जानना चाहते हैं कि  वहां के बिजली कनेक्शन किसके नाम पर है। पता नहीं अदालत में ऐसी दलीलें कितने दिनों तक टिक पायेंगी पर यह साफ है कि हेमंत सोरेन ने अब भाजपा नेतृत्व से सीधे सीधे दो दो हाथ करने की ठान ली है। इस एक मोर्चाबंदी की वजह से वह अब इंडिया गठबंधन में अपने कद को ऊपर ले जाने में सफल रहे हैं।

दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल है, जिनके साथ कांग्रेस  की खटर पटर के बाद अंततः गाड़ी पटरी पर आती दिख रही है और आम आदमी पार्टी ने साफ कर दिया है कि सीटों क तालमेल होने की स्थिति में पार्टी के  नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। यानी इस खेमा में सपने टूट रहे हैं। गनीमत है कि उत्तर प्रदेश के तालमेल को किसी तरह प्रियंका गांधी के फोन ने बचा लिया है। वरना वहां भी गाड़ी गड्डे में जाने वाली थी।

इन्हीं बातों से एक पुराना गीत याद आने लगा है। फिल्म  गूंज उठी शहनाई के इस गीत को लिखा था भरत व्यास ने और संगीत में ढाला था बसंत देसाई ने। इसे लता मंगेशकर ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

टूट गया, टूट गया

दिल का खिलौना हाए टूट गया

कोई लूटेरा आ के लूट गया

हुआ क्या कुसूर ऐसा सैय्य़ा हमारा

जाते हुये जो तूने हमें ना पुकारा

उल्फ़त का तार तोडा, हमे मझधार छोडा

हम तो चले थे ले के तेरा ही सहारा

साथी हमारा हम से छूट गया

कैसी परदेसी तू ने प्रीत लगाई

चैन भी खोया, हम ने नींद गँवाई

तेरा ऐतबार कर के, हाए इंतजार कर के

खुशियों के बदले ग़म की दुनिया बसाई

जालीम ज़माना हम से रूठ गया

इस गीत को एकतरफा मान लेना भी गलती होगी। यह इंडिया का मैंगो मैन यानी आम आदमी है जो कभी भी कुछ भी कमाल दिखा सकता है। अब सब कुछ ठीक चल रहा था। भाजपा का नारा था फिर एकबार मोदी सरकार और अबकी बार चारसौ पार। चार सौ पार हो या ना हो, मोदी सरकार के फिर से सत्ता में आने पर कोई संदेह नहीं था। अचानक से किसान आंदोलन खड़ा हो गया। पिछली बार की तरह इस बार की किसान आंदोलन को हल्के में लेना ही मोदी सरकार के लिए भारी पड़ गया है। एक नौजवान की मौत के बाद तो अन्य किसान यूनियन भी इसमें शामिल हो रहे हैं। जोड़ घटाव कर देखें तो यह भाजपा के लिए करीब सत्तर सीटों का चैलेंज है। पिछली बार तो आंदोलन के बाद भी पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भाजपा को सफलता मिली थी लेकिन बार बार एक ही दांव काम कर जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं होती।

दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉंड को खारिज कर नया टेंशन खड़ा कर दिया है। आंकड़ों से पता है कि सबसे ज्यादा चंदा तो भाजपा को ही मिला है। अब आंकड़े जब सार्वजनिक होंगे तो पता चलेगा कि आखिर इतना सारा धन भाजपा को किनलोगों या कंपनियों ने दिया है। इन कंपनियों द्वारा चंदा देना गलत नहीं है लेकिन अगर चंदे के बदले कोई अप्रत्याशित लाभ मिला है तो सवाल खड़े होंगे। इसलिए चैन तो इधर से भी खोया हुआ। चुनाव चीज ही ऐसी  है जो अंतिम समय तक टेंशन ही टेंशन देती है।