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मंदिर के नाम पर पागलपन कर रहे हैं मोदीः शंकराचार्य

अयोध्या के मूर्ति स्थापन में नियमों के उल्लंघन पर नाराज धर्म प्रधान


  • जो हमसे टकराये सत्ता से बेदखल हो गये

  • हमारी जिम्मेदारी धर्म की रक्षा करने की है

  • मोदी का व्यवहार धर्म के अनुकूल नहीं


राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को लेकर शंकराचार्य का केंद्र सरकार और भाजपा से टकराव तेज हो गया है। निर्मोही अखाड़े ने भी शंकराचार्य के सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं के अनुसार राम मंदिर में रामलला की आत्मा को स्थापित नहीं किया जा रहा है।

पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने दो दिन पहले शिकायत की थी कि राम मंदिर के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यवहार पागलपन का संकेत था। उन्होंने यह भी बताया कि वह 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन में नहीं जाएंगे। उधर, भाजपा ने आरोप लगाया कि शंकराचार्य कांग्रेस के सुर में बोल रहे हैं।

सोमवार को गंगासागर पर अपनी प्रतिक्रिया में शंकराचार्य ने फिर कहा, कांग्रेस काल में जब मैंने कुछ कहा था तो क्या जनसंघ की ओर से कहा था?  मैं किसी भी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं हूं। यह बात हर कोई जानता है, मोदी, योगी (योगी आदित्यनाथ), सोनिया (सोनिया गांधी)।

भाजपा की ओर से अपने ऊपर हो रहे हमले के मद्देनजर शंकराचार्य ने गंगासागर में कहा, जिसकी बातों में लालच, भय और चिंता हो, उसकी बातों का कोई असर नहीं होता। मेरे शब्दों में लालच, भय और चिंता नहीं है। तो मेरी बात का असर होता है। सत्ता बदलती है। जिनलोगों ने मेरी आलोचना की थी, उनके लिए मुझे कुछ नहीं करना पड़ा, वे सारे के सारे खुद ही सत्ता से बेदखल कर दिये गये।

पुरी के शंकराचार्य, उत्तराखंड के ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के बाद निर्मोही अखाड़े ने भी शिकायत की कि रामलला की प्राण स्थापना में रामानंदी परंपरा का पालन नहीं किया जा रहा है। उनका दावा है कि राम मंदिर के अधिकारियों ने रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के उनके प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।

निर्मोही अखाड़ा राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में वादी पक्ष में से एक था। अयोध्या में निर्मोही अखाड़े के एक पदाधिकारी के मुताबिक, रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में 500 साल की परंपरा का पालन नहीं किया जा रहा है। उनका कहना है, रामलला की पूजा हमेशा रामानंदी की परंपरा से होती आई है। लेकिन श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट इस बार मिली-जुली परंपरा निभा रहा है। यह कतई स्वीकार्य नहीं है। हमने कहा, परंपरा के मुताबिक रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होनी चाहिए। लेकिन हमारी बात को नजरअंदाज कर दिया गया।

उत्तराखंड के ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य अभिमुक्तेश्वरानंद ने कहा था, 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर में प्राण स्थापना समारोह का आयोजन किया गया है। लेकिन शास्त्र कहते हैं कि स्थापना तभी संभव है जब मंदिर पूरा बनेगा। क्योंकि मंदिर भगवान का शरीर है। यदि शरीर पूर्ण नहीं है तो उसमें जीवन कैसे स्थापित किया जा सकता है?

ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य बताते हैं, यदि मंदिर शरीर है, तो शीर्ष बिंदु या शिखर भगवान की आंख है। सिर का गुंबद भगवान का सिर है। मंदिर के शीर्ष पर लहराने वाला झंडा भगवान के बालों का प्रतीक है। लेकिन राम मंदिर में इनमें से कोई भी पूरा नहीं हुआ। तो वहां भगवान का शरीर अधूरा है। उस अपूर्ण शरीर में आत्मा की स्थापना के समारोह में भाग लेना जानबूझकर शास्त्रों के उल्लंघन को सहमति देना है।