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महिला सशक्तिकरण के भाजपा के दावे की परख

महिला पहलवानों के मुद्दे पर अब ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा के अंदर भी लोगों के सब्र का बांध टूट रहा है। पहले हरियाणा से इसबारे में बयान आये थे। उसके बाद महाराष्ट्र से भी ऐसा ही स्वर सुनाई पड़ा है। जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, वहां के भाजपा नेता यह अच्छी तरह समझ रहे हैं कि पूरे घटनाक्रम का उनके इलाके की महिलाओं पर क्या असर हो रहा है और उसके क्या नतीजे हो सकते हैं।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की खिल्ली उड़ाना भाजपा को क्यों भारी पड़ गया था, यह भी भाजपा के लोग अच्छी तरह जान चुके हैं। इसके बाद भी दिल्ली में हालात कुछ ऐसे हो गये हैं कि सवालों की वजह से केंद्रीय मंत्री को दौड़कर भागना पड़ रहा है।

जाहिर है कि आने वाले दिनों में हर स्थान पर जनता भाजपा के लोगों से ऐसे ही सवाल पूछेगी और उनके पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं होगा। महाराष्ट्र की बात करें तो भाजपा सांसद प्रीतम मुंडे ने कहा है कि किसी भी महिला द्वारा की गई शिकायत का संज्ञान लिया जाना चाहिए।

मुंडे ने कहा कि बाद में जांच अधिकारी तय कर सकते हैं कि शिकायत सही है या नहीं। इस बारे में पूछे जाने पर मुंडे ने कहा, मैं सांसद के तौर पर नहीं, बल्कि एक महिला के तौर पर कहती हूं कि अगर किसी महिला की तरफ से ऐसी शिकायत आती है तो उसका संज्ञान लिया जाना चाहिए। इसकी पुष्टि की जानी चाहिए।”

सत्यापन के बाद, अधिकारियों को यह तय करना चाहिए कि यह उचित है या अनुचित। बीड से लोकसभा सदस्य ने कहा, अगर संज्ञान नहीं लिया जाता है, तो लोकतंत्र में इसका स्वागत नहीं किया जाता है। इस मामले का संज्ञान अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिया जा रहा है। अब अगर मैं जांच समिति की मांग करती हूं तो यह पब्लिसिटी स्टंट होगा। मुझे उम्मीद है कि इस मामले में कार्रवाई की जाएगी।

उससे पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र सिंह भी ऐसा ही बयान दे चुके है। उन्होंने कहा कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के सामने यह मुद्दा वह उठा चुके हैं और बता चुके हैं कि इससे पार्टी की साख को नुकसान पहुंच रहा है। भाजपा के लिए चिंता का विषय यह है कि जिस तेवर से नरेंद्र मोदी बार बार महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, वह दावा ऐसा मामलों में सही साबित नहीं होता।

इसके पहले भी कई ऐसे मामले सामने आये हैं, जिनमें पार्टी की छवि अपने दावे से अलग नजर आयी है। श्री सिंह ने यह भी कहा है कि एक बार अगर मान भी लें कि महिला पहलवान किसी राजनीतिक दल के इशारे पर काम कर रहे हैं या किसी के द्वारा उकसाया गया है, उनकी आवाज़ सुनी जानी चाहिए और सुनी जानी चाहिए।

वे एक ऐसा मुद्दा उठा रहे हैं जिसका समाधान किया जाना चाहिए। उन्होंने खेल संघों के नियंत्रण को लेकर भी सवाल उठाए। समस्या राजनेताओं, विशेष रूप से सत्ता में रहने वालों के साथ-साथ उद्योगपतियों और ऐसे संघों को चलाने वाले नौकरशाहों के साथ है। सरकार को खेल संघों को चलाने के तरीके में सुधार करना चाहिए।

इससे पहले हरियाणा भाजपा अध्यक्ष ओम प्रकाश धनखड़ ने कहा कि उन्होंने इसे केंद्रीय खेल मंत्री अनुराग ठाकुर के सामने उठाया था। उन्होंने कहा, मैंने इस बात पर जोर दिया कि जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने वाली हमारी बेटियां हैं और उन्हें न्याय मिलना चाहिए। मंत्री ने कहा कि उन्हें निश्चित रूप से न्याय मिलेगा। हरियाणा की स्थिति और बिगड़ रही है क्योंकि सारे आंदोलनकारी वहां के लोग हैं। इससे हरियाणा भाजपा के भीतर बेचैनी बढ़ रही है।

पहलवानों को राज्य के किसान संघों का पूरा समर्थन मिला है, जो भाजपा सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ के प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध की बात कर रहे हैं। यह भी भाजपा के लिए अतिरिक्त चुनौती बन चुकी है। हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज बयान देने वालों में शामिल हैं, जिन्होंने पहलवानों की मांगों को पार्टी के भीतर उच्चतम स्तर” तक पहुंचाने की पेशकश की थी। इसके बीच केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी का सवालों से दौड़कर भागना भी दुनिया ने देखा है।

इसलिए चुनावी राज्यों के भाजपा नेता अच्छी तरह इस  बात को समझ रहे हैं कि आंदोलन के मुद्दे पर किसान आंदोलन की तरह ही अड़ियल रवैया अपनाना उनके अपने राज्य में घाटे का सौदा साबित हो सकता है। भले ही सार्वजनिक तौर पर कोई कुछ ना कहें लेकिन अंदरखाने में सभी को वह सच पता होगा, जिसे आम जनता महसूस करती है। इसलिए भाजपा के नेता अब महिला सशक्तिकरण के मुद्दों पर बयान देने से कतराने लगा हैं। उन्हें यह भय सताने लगा है कि इस मुद्दे पर बात करते ही महिला पहलवानों का मुद्दा फिर से खड़ा हो जाएगा।