कोरापुट के ग्रामीणों ने फर्जी अंगूठा छाप की शिकायत की है
जो साइन करते हैं उनका अंगूठा लगा
सैकड़ो आदिवासियों के बेदखल होना पड़ेगा
नई बॉक्साइट खदान की वजह से यह हाल
राष्ट्रीय खबर
भुवनेश्वरः रघुनाथ खरा उस कागज के टुकड़े पर अपना अंगूठे का निशान देखकर स्तब्ध रह गए, जिसमें घोषणा की गई थी कि उन्होंने अपने गाँव की प्राचीन वन भूमि पर बॉक्साइट के उत्खनन के सरकारी प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की है। उनका कहना है कि उन्होंने वह अंगूठे का निशान कभी नहीं दिया। खरा ने आरोप लगाया, मैं हमेशा अंग्रेजी में हस्ताक्षर करता हूँ। वह किसी और का अंगूठा था। खरा पूर्वी भारत के ओडिशा राज्य के आदिवासी बहुल कोरापुट जिले के बाल्डा गाँव के एक दुकानदार हैं।
खरा बाल्डा और पड़ोसी बन्नूर गाँव के उन सैकड़ों स्वदेशी आदिवासी लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने नई बॉक्साइट खदान के कारण अपनी जमीनें खो दी हैं। इसे कलिंगा एल्यूमिना लिमिटेड द्वारा विकसित किया जा रहा है, जो भारत के दूसरे सबसे अमीर व्यवसायी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी गौतम अडाणी के स्वामित्व वाले समूह अडाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड की एक सहायक कंपनी है।
2.4 करोड़ डॉलर की यह परियोजना मेज के आकार वाली बाल्डा पहाड़ी के एक बड़े हिस्से को निगल जाएगी — जो जंगलों, घास के मैदानों और गुफाओं का घर है, जिन्हें इसके आसपास के कम से कम 10 आदिवासी गाँवों द्वारा पवित्र माना जाता है।
परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए, पिछले साल 9 अक्टूबर को बाल्डा और बन्नूर में आयोजित ग्राम सभा (ग्राम परिषद) की बैठकों के दौरान कथित तौर पर लगभग 600 आदिवासियों के फर्जी हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान एकत्र किए गए थे। बन्नूर बाल्डा से 5 किलोमीटर दूर है।
खरा का कहना है कि वह बाल्डा की बैठक में कभी शामिल ही नहीं हुए और इसके बजाय ग्राम पंचायत कार्यालय से लगभग 100 मीटर दूर अपनी पत्नी, बहन और अन्य ग्रामीणों के साथ प्रस्तावित खदान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उन्होंने कहा, यह [अंगूठे का निशान] फर्जी था। हम गाँव की बैठक में बिल्कुल शामिल नहीं हुए। हम सभी बाहर विरोध प्रदर्शन में व्यस्त थे।
भारत का संविधान अपनी पारंपरिक जमीनों पर स्वदेशी समुदायों के अधिकारों को मान्यता देता है। वन कानून और आदिवासी क्षेत्रों को स्वायत्तता देने वाले कानून यह निर्धारित करते हैं कि अन्य उद्देश्यों के लिए ऐसी भूमि के किसी भी विचलन (डाइवर्जन) के लिए ग्राम सभा के प्रस्ताव अनिवार्य हैं। ग्राम सभा की बैठक में पारित प्रस्ताव तभी मान्य होता है जब गाँव के सभी वयस्कों में से कम से कम 50 प्रतिशत लोग लिखित रूप में इस पर अपनी सहमति दें। सरकारी दस्तावेजों का दावा है कि सभी 580 वयस्कों — बाल्डा में 360 और बन्नूर में 227 — ने अडाणी खदान के लिए अपनी जमीन देने पर सहमति व्यक्त की। लेकिन दोनों गाँवों के निर्वाचित गाँव प्रमुखों (सरपंचों) ने किसी भी हस्ताक्षर के एकत्र किए जाने से इनकार किया और दोनों बैठकों को अमान्य करार दिया।
यहाँ तक कि दोनों ग्राम सभा बैठकों में ग्रामीणों द्वारा ली गई तस्वीरों में कुल मिलाकर लगभग 100 लोगों की उपस्थिति दिखाई देती है — बाल्डा में लगभग 40 और बन्नूर में 68 — जो एक वैध प्रस्ताव पारित करने के लिए आवश्यक न्यूनतम 50 प्रतिशत कोरम से काफी कम है। इसके अलावा, ग्रामीणों का आरोप है कि संकल्प दस्तावेजों पर अधिकांश हस्ताक्षर फर्जी, जाली या दूसरों के नाम पर बनाए गए हैं।
वे यह भी दावा करते हैं कि दस्तावेजों में काल्पनिक व्यक्तियों के हस्ताक्षर और यहाँ तक कि उन लोगों के नाम भी शामिल हैं जिनकी वर्षों पहले मृत्यु हो चुकी है। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि एक पिछली, असंबंधित ग्राम सभा की बैठक से उनके हस्ताक्षरों को धोखाधड़ी से बॉक्साइट खदान के दस्तावेज पर चिपका दिया गया था। इन आरोपों पर प्रतिक्रिया मांगने के लिए 18 अगस्त को अडाणी समूह और उसके संचार प्रमुख को ईमेल भेजा था। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। कोरापुट जिले के पुलिस अधीक्षक रोहित वर्मा ने भी कोई जवाब नहीं दिया।