एक और न्यायविद ने खुलकर एसआईआर की खुली आलोचना की
वोटर लिस्ट से नाम हटाना गंभीर चूक
ऐसा चुनाव आयोग नहीं होना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट को दखल देना ही चाहिए
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नरिमन ने निर्वाचन आयोग के कामकाज और बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने की घटनाओं पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि संविधान और लोकतंत्र के दिल यानी मताधिकार पर वर्तमान में बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है। राजकोट के राजकुमार कॉलेज में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति नरिमन ने कहा, आप एक ऐसा निर्वाचन आयोग नहीं रख सकते जो इस तरह से काम करे या कुप्रबंधन करे। उन्होंने इस परेशान करने वाले घटनाक्रम को सुधारने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के तत्काल हस्तक्षेप की पुरजोर वकालत की।
न्यायमूर्ति नरिमन ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी बात की। उन्होंने 2023 के ऐतिहासिक अनूप बरणवाल मामले के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें अदालत ने कहा था कि संसद ने अनुच्छेद 324 के तहत सीईसी की नियुक्ति के लिए कोई कानून नहीं बनाया है। अदालत ने सुझाव दिया था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश सीजेआई की एक समिति (कॉलेजियम) मिलकर एक स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यक्ति का चयन करे। हालांकि, इसके बाद संसद ने 2023 में एक नया कानून पारित कर दिया, जिसके तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता को शामिल कर लिया गया, जिससे नियुक्ति प्रक्रिया फिर से सरकार के हाथों में सिमट गई।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के संशोधन का जिक्र करते हुए पूर्व जस्टिस ने दावा किया कि लगभग 90 लाख मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित कर दिया गया, जिनमें से करीब 22 लाख लोगों ने इसके खिलाफ अपील दायर की। उन्होंने बताया, इन 22 लाख मतदाताओं में से करीब एक लाख मतदाताओं की अपीलों पर फैसले आए, जिनमें से 93 प्रतिशत फैसले मतदाताओं के पक्ष में रहे। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक आम नागरिक और भारत के वोटर को पूरी तरह से अवैध तरीके से मताधिकार से वंचित किया गया, ताकि कोई सरकार अपनी इच्छा के अनुसार परिणाम हासिल कर सके?
न्यायमूर्ति नरिमन ने एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ सेवा दे रहे अन्य दो चुनाव आयुक्तों ने 14 मौकों पर फैसलों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पूरी तरह से स्वतंत्र और निष्पक्ष होनी चाहिए, ताकि चुनाव प्रक्रिया और लोकतंत्र की निष्ठा पर कोई आंच न आए।