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ओडिशा में लंबे अंतराल के बाद अचानक से सियासी पारा हाई

छात्र संघ चुनाव की आहट से गर्म राजनीति

जेन-जी के हाथ में सत्ता की चाबी

आठ साल के बाद बजी रणभेरी

सिर्फ भाजपा का संगठन अभी सक्रिय

प्रसन्न महांति

भुवनेश्वरः  ओडिशा के डिग्री कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में आठ साल के लंबे अंतराल के बाद छात्र संघ चुनाव की घोषणा ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। 2017 के बाद से, कभी हिंसा, कभी तितली चक्रवात तो कभी कोविड-19 महामारी का हवाला देकर पिछली बीजेड की सरकार चुनाव टालती रही, जिससे कैंपस में छात्र राजनीति की नर्सरी लगभग सूख गई थी। लेकिन अब, भाजपा सरकार ने अपने चुनावी वादे को पूरा करते हुए 15 अक्टूबर को चुनाव कराने का ऐतिहासिक फैसला लिया है, जिससे छात्रों में नई ऊर्जा का संचार हुआ है।

चुनाव का दस दिन का संक्षिप्त कार्यक्रम (7 अक्टूबर को अधिसूचना, 9 को नामांकन) विपक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती है। बीजू जनता दल की छात्र इकाई (बीसीजेडी) और कांग्रेस की एनएसयूआई, जिनका जमीनी संगठन आठ वर्षों में बिखर चुका है, के पास तैयारी का समय न के बराबर है। वहीं, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) पिछले दो वर्षों से कैंपस में सक्रिय है, जिससे भाजपा के इस कदम को एक सोची-समधी रणनीति माना जा रहा है।

इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसके असली निर्णायक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि जेन-जी के युवा मतदाता हैं, जो पोस्टर-लाउडस्पीकर के बजाय रील और ठोस मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। सरकार ने भी नियमों को कड़ा कर दिया है: मुद्रित पोस्टर प्रतिबंधित हैं, चुनाव खर्च की सीमा 5,000 रुपये तय की गई है, और जाति-धर्म के आधार पर वोट मांगने या एआई-निर्मित फर्जी सामग्री के इस्तेमाल पर सख्त कार्रवाई होगी। जेन-जी अब वाई-फाई, अच्छी कैंटीन, प्लेसमेंट और मानसिक स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं पर बात करने वाले उम्मीदवारों को ही अपना नेता चुनेगी। 15 अक्टूबर को होने वाले ये चुनाव केवल छात्र संघ पदाधिकारियों का चयन नहीं करेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि ओडिशा का भविष्य किस दिशा में सोच रहा है।