इलाहाबाद उच्च न्यायालय का पचास हजार का मुआवजा देने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फैसला
कमलेश कुमार को हिरासत में रखा था
पुलिस वालों ने भी अपनी गलती मान ली
राष्ट्रीय खबर
लखनऊः इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह एक महत्वपूर्ण और मानवीय फैसले में उत्तर प्रदेश राज्य सरकार को एक व्यक्ति को पचास हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह मुआवजा उस व्यक्ति को अवैध रूप से पांच दिनों तक पुलिस हिरासत में रखने के एवज में दिया जाएगा।
पीड़ित कमलेश कुमार को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के 15 अगस्त से 19 अगस्त 2026 के बीच पांच दिनों तक अवैध पुलिस हिरासत में रखा गया था, और इस अवधि के दौरान उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने पेश भी नहीं किया गया था। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबीस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सख्त आदेश पारित किया है।
कानूनी प्रावधानों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के चौबीस घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य होता है, लेकिन इस मामले में पुलिस अधिकारियों द्वारा इस बुनियादी नियम का खुला उल्लंघन किया गया।
कमलेश कुमार को स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त से लेकर 19 अगस्त तक अवैध रूप से थाने में बैठाकर रखा गया, जो सीधे तौर पर नागरिक के मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है। जब इस मनमाने और गैर-कानूनी कृत्य के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया गया, तो उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को समझते हुए राज्य सरकार को तत्काल मुआवजा देने का निर्देश जारी किया, ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही न दोहराई जाए।
इस मामले का एक सबसे सकारात्मक और उल्लेखनीय पहलू यह रहा कि सुनवाई के दौरान पुलिस अधिकारियों ने अपनी गलती छिपाने की कोशिश करने के बजाय अदालत के सामने पूरी ईमानदारी से अपनी भूल स्वीकार कर ली। न्यायालय ने पुलिस प्रशासन के इस स्पष्ट और खुले रुख की जमकर सराहना की।
अदालत का मानना था कि अपनी गलती को स्वीकार करना और न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रतीक है। हालांकि, गलती मान लेने के बावजूद कानून के उल्लंघन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन के कारण पीड़ित को हर्जाना देना कानूनी रूप से अनिवार्य था, जिसके तहत अदालत ने यह वित्तीय मुआवजा तय किया। यह फैसला पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही तय करने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक मिल का पत्थर साबित होगा।