कांग्रेस से रिश्ता, नवीन के बाद ममता
दोनों दलों का उदय कांग्रेस से ही
दोनों दलों की निकटता रही थी
बाद में दोनों ही अलग हो गये
प्रसन्न मोहंति
भुवनेश्वरः ओडिशा की राजनीति में इस साल मार्च में जो हुआ, वह 27 साल में कभी नहीं हुआ था। बीजू जनता दल ने राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस का हाथ थाम लिया। और अब बंगाल में ममता बनर्जी ठीक वही कर रही हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है – नवीन के बाद ममता, कांग्रेस से यही दोस्ती का रास्ता?
1997 में जब बीजद बनी तो नवीन ने साफ कहा था, कांग्रेस ने ओडिशा को लूटा है, बीजू बाबू के सपनों को तोड़ा है। 1997 से 2024 तक बीजद की पूरी राजनीति इसी एंटी-कांग्रेस नैरेटिव पर चली। दूसरी तरफ 1998 में ममता ने कांग्रेस छोड़ते हुए कहा था, बंगाल में कांग्रेस सीपीएम से मिली हुई है, लड़ नहीं रही। और तृणमूल बना दी। 34 साल के वाम राज को उखाड़ा, कांग्रेस को बंगाल में हाशिए पर धकेल दिया। दोनों में एक बात समान थी वह थी दोनों कांग्रेस विरोधी योद्धा साबित हुए थे।
पहला सीन – भुवनेश्वर, मार्च 2026: राज्यसभा की 4 सीटें। भाजपा की चौथी सीट पर जीत तय लग रही थी। तभी नवीन पटनायक ने चौंकाया। उन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भक्त चरण दास और सीपीएम को बुलाया और साझा उम्मीदवार डॉ. दत्तेश्वर होता को जिताया। नारा दिया – धर्मनिरपेक्ष ताकतें एक हों।
दूसरा सीन – नंदीग्राम, सितंबर 2026: नंदीग्राम उपचुनाव। वही नंदीग्राम जहां से ममता ने वाम शासन को उखाड़ा था। इस बार ममता गुट ने अपना प्रत्याशी नहीं उतारा। एलान किया – हमारा समर्थन कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को। कारण वही, भाजपा को हराना है, इंडिया गठबंधन को बचाना है। दरअसल यह दिल का नहीं, दिमाग का समझौता है।
दुश्मन बदल गया: कल तक कांग्रेस दुश्मन थी, आज भाजपा सबसे बड़ी चुनौती है। बीजद को सत्ता से भाजपा ने हटाया, तृणमूल की टक्कर भी भाजपा से है। तो पुराने दुश्मन में नया दोस्त दिख रहा है। सत्ता में रहते किसी की जरूरत नहीं थी। अब दोनों विपक्ष में हैं। तृणमूल के दो टुकड़े हो गए हैं, चुनाव चिन्ह तक खतरे में है। बीजद 51 सीटों पर सिमट गई है।
अकेले लड़ेंगे तो अस्तित्व खतरे में। कांग्रेस के साथ रहेंगे तो राष्ट्रीय कवच मिलेगा। 90 के दशक का वोटर कांग्रेस से नफरत करता था। 2026 का वोटर भाजपा बनाम इंडिया की लड़ाई देख रहा है। इसलिए कांग्रेस के साथ आना अब वोटर को खलता नहीं।
तो क्या यह स्थायी दोस्ती है? शायद नहीं। राजनीति में न कोई स्थायी दुश्मन होता है, न दोस्त। यह वक्त की जरूरत का गठजोड़ है। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकता का यह सबसे बड़ा प्रयोग है। कल तक जो कहते थे – कांग्रेस हटाओ, आज कह रहे हैं – कांग्रेस बचाओ, क्योंकि भाजपा को हराना है। कभी दुश्मनी, कभी दोस्ती – यही तो राजनीति है।