उसके तीन सांसद एनडीए में जाने को तैयार नहीं
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तीनों को अपने वोट बैंक की चिंता
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मुस्लिम आबादी वाले इलाके के सांसद
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शुभेंदु से रिश्ता बनाकर चल रहे हैं सभी
राष्ट्रीय खबर
कोलकाताः नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के भीतर उस समय गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल और आंतरिक कलह खुलकर सामने आ गई, जब इस नए और छोटे राजनीतिक दल के तीन प्रमुख मुस्लिम लोकसभा सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी के साथ पार्टी की बढ़ती नजदीकियों और गठबंधन पर कड़ी आपत्ति जताई। राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को एक बड़े घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।
प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का दामन छोड़कर इस राजनीतिक दल में शामिल होने वाले बागी सांसदों—अबू ताहेर खान, खलीलुर रहमान और यूसुफ पठान ने सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की बैठकों से पूरी तरह दूरी बना ली है। इन सांसदों के इस कदम के पीछे मुख्य कारण यह है कि उन्हें यह गहरा डर सता रहा है कि भाजपा के साथ किसी भी प्रकार की राजनीतिक निकटता या गठबंधन से उनका पारंपरिक और वफादार मतदाता आधार हमेशा के लिए छिटक सकता है, जिससे उनके राजनीतिक भविष्य पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
इसी कड़ी में शनिवार को सांसद अबू ताहेर खान और खलीलुर रहमान ने एक अहम कदम उठाते हुए मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने मुर्शिदाबाद क्षेत्र में चल रहे विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) अभियान के नाम पर स्थानीय लोगों को परेशान किए जाने का गंभीर आरोप लगाया और इसके खिलाफ अपनी आपत्ति दर्ज कराई। मुलाकात के बाद मीडिया से बातचीत में अबू ताहेर खान ने पूरी स्पष्टता के साथ यह घोषणा की कि वे किसी भी कीमत पर भाजपा के साथ नहीं जाएंगे और न ही एनडीए गठबंधन का हिस्सा बनेंगे।
दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति पूरी तरह वफादार माने जाने वाले तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी और विधायक कुणाल घोष ने इन बागी नेताओं पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इन तीनों सांसदों पर जनता को गुमराह करने और अल्पसंख्यक मतदाताओं के साथ खुला विश्वासघात करने का गंभीर आरोप लगाया है। टीएमसी नेताओं का कहना है कि इन सांसदों ने ममता बनर्जी के नाम पर और एंटी-भाजपा वोटों के मजबूत सहारे पर ही लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की थी, लेकिन अब वे अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थों के चलते जनता के जनादेश के साथ छल कर रहे हैं। इस अंदरूनी कलह से एनसीपीआई और एनडीए दोनों के भीतर राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई है।