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चौबीस साल की दिनरात मेहनत दो हफ्ते में खत्म

भारतीय राजनीति के समकालीन परिदृश्य में जन-आंदोलनों और डिजिटल युग के प्रचार-प्रसार तंत्र के बीच का संघर्ष बेहद तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले आयोजित युवा विरोध प्रदर्शनों ने देश की राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

विश्लेषकों का मानना है कि पिछले दो दशकों से अधिक समय यानी 24 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की जो एक अजेय और मजबूत सार्वजनिक छवि का निर्माण किया गया था, उसे इन दो सप्ताह के आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों ने एक अभूतपूर्व चुनौती दी है। राजनीतिक इतिहास में यह घटना इस बात का जीवंत प्रमाण बन गई है कि चुनावी जीत और हार राजनीति का केवल एक पहलू मात्र है, जबकि जमीनी स्तर पर होने वाली जन-लामबंदी दशकों से गढ़ी गई राजनीतिक कहानियों और नैरेटिव्स को कुछ ही हफ्तों में हिलाकर रख सकती है।

सदियों से लोग यह मानते आए हैं कि सत्ता के विशिष्ट ढांचे और अधिकार अपरिवर्तनीय हैं और उन्हें सहना ही पड़ेगा, लेकिन इतिहास के पन्नों में समय-समय पर यह दर्ज होता रहा है कि कैसे कुछ हफ्तों के भीतर व्यवस्था की नींव तक हिल जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा का अध्ययन करने वाले राजनीतिक पंडित यह स्वीकार करते हैं कि उनकी वर्तमान छवि का निर्माण कोई एक दिन का परिणाम नहीं है।

पिछले 24 वर्षों में गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यकाल से लेकर देश के प्रधानमंत्री पद तक की उनकी इस लंबी राजनीतिक यात्रा में करोड़ों रुपये के भारी-भरकम बजट, आधुनिक संचार माध्यमों, जनसंपर्क रणनीतियों और मीडिया प्रबंधन का उपयोग किया गया है। इस लंबी अवधि में उनके समर्थकों द्वारा उन्हें एक ऐसे कुशल और दृढ़निश्चयी राजनेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो किसी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस के सीधे संवाद के बिना भी जनता के दिलों पर राज करते हैं।

कुछ अति-प्रशंसकों उनकी तुलना अलौकिक शक्तियों या विशिष्ट अवतारों तक से कर दी जाती है। लेकिन अब सोशल मीडिया में मोदी भक्ति के लिए पहचाने गये लोगों को अपने ही पोस्टों पर आम जनता के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। मात्र दो हफ्तों के भीतर हुए इन मुखर प्रदर्शनों ने उस संपूर्ण 24 वर्षीय ढांचे को झकझोर कर रख दिया है। यह राजनीतिक आघात किसी भी पारंपरिक चुनावी हार से कहीं अधिक गहरा माना जा रहा है, क्योंकि चुनाव परिणामों में हार-जीत के चक्र को तो बदला जा सकता है, परंतु नेता की अजेय होने की मनोवैज्ञानिक धारणा का टूटना राजनीतिक परिदृश्य को दूरगामी रूप से प्रभावित करता है।

विरोध प्रदर्शनों के दौरान वक्ताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने इस बात पर विशेष चिंता व्यक्त की है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में लोकतांत्रिक संस्थाओं और सत्ता के प्रमुख अंगों पर किस प्रकार का नियंत्रण स्थापित किया जा रहा है। यदि मौजूदा सरकार इसी प्रकार सत्ता के सभी स्तरों और संस्थागत नियंत्रणों को अपने पक्ष में मजबूती से जकड़े रखती है, तो आने वाले समय में विपक्षी दलों, स्वतंत्र आवाजों और आम नागरिकों के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करना बेहद कठिन हो जाएगा।

इस गंभीर परिस्थिति को देखते हुए यह आह्वान किया गया है कि देश के सभी विपक्षी दलों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सक्रिय नागरिक समाज को दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर एकजुट होना चाहिए। लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की गरिमा, मीडिया की निष्पक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाए रखने के लिए एक संयुक्त और मजबूत प्रतिरोध अनिवार्य हो चुका है। इतिहास गवाह है कि जब-जब संस्थागत नियंत्रण एकतरफा होने लगते हैं, तब-तब जनता के स्वतःस्फूर्त आंदोलन ही लोकतंत्र की अंतिम रक्षा पंक्ति साबित होते हैं।

वर्तमान राजनीतिक उथल-पुथल इस बात का भी अहसास कराती है कि देश का भविष्य और राजनीतिक पटकथा इस समय लिखी जा रही है। किसी को यह पूरी तरह से ज्ञात नहीं है कि आने वाले दिनों में देश और समाज किस दिशा में आगे बढ़ेंगे। हर एक नागरिक और राजनीतिक इकाई की इस महान कथा में अपनी एक निश्चित भूमिका है। आम तौर पर लोगों के मन में यह गहरी धारणा बैठ जाती है कि वे जिन विषम या अपरिवर्तनीय परिस्थितियों में जी रहे हैं, वे वैसी ही हजारों वर्षों तक बनी रहेंगी। परंतु जंतर-मंतर पर हुए इन दो हफ्तों के प्रदर्शनों ने यह साबित कर दिया कि व्यवस्था की जड़ें कितनी भी गहरी क्यों न हों, यदि जन-चेतना जागृत हो जाए, तो वे जड़ें भी अपनी जगह से हिल सकती हैं। यह दौर इस बात का स्मरण कराता है कि राजनीति कोई स्थिर संरचना नहीं है, बल्कि यह निरंतर संघर्ष, संवाद और जन-आकांक्षाओं के प्रवाह का परिणाम है।