नीट यूजी विरोध प्रदर्शन पर शीर्ष अदालत की हिदायत
उनकी बातों को सुनना बहुत जरूरी है
याचिकाकर्ता ने हिंसा की दलीलें दी थी
युवाओं को समझाना और शांत रखना जरूरी
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को नीट-यूजी पेपर लीक के खिलाफ देश भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों और राजधानी में उपजी स्थिति को लेकर एक बेहद संवेदनशील एवं संतुलित टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने अभिभावक की सी भूमिका निभाते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि इस संवेदनशील मामले में छात्रों, युवाओं और आंदोलन के आयोजकों के साथ किसी भी प्रकार का आक्रामक रुख अपनाने के बजाय उन्हें समझाना-बुझाना और संवाद स्थापित करना ही सबसे बेहतर विकल्प होगा।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मामले की सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि असंतोष से निपटने का सबसे बेहतर तरीका उनकी काउंसलिंग करना, उन्हें शांत कराना और उनकी बात को धैर्यपूर्वक सुनना है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सबसे शक्तिशाली साधन केवल लाठी या सख्ती नहीं, बल्कि तर्क और सार्थक संवाद है और सरकार बखूबी जानती है कि इस प्रकार की परिस्थितियों से कैसे निपटा जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता मनीष कुमार सोलंकी की पैरवी कर रहे अधिवक्ता रिजवान अहमद ने अदालत के समक्ष अपनी कड़ी आपत्ति और चिंताएं रखीं। वकील ने तर्क दिया कि घटना को पंद्रह दिन बीत चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद राष्ट्रीय राजधानी के उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्रों में इस तरह के उपद्रव और विरोध प्रदर्शनों के मुख्य आयोजक बेखौफ होकर एक टीवी चैनल से दूसरे चैनल पर घूम रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ये लोग लगातार भड़काऊ और उत्तेजक बयान दे रहे हैं, जिससे विरोध की आग बुझने के बजाय लगातार सुलग रही है और उसे और अधिक हवा मिल रही है।
अपनी बात को और मजबूती देते हुए अधिवक्ता ने राजस्थान में हाल ही में घटी एक कानून-व्यवस्था से जुड़ी घटना का हवाला दिया। उन्होंने अदालत के सामने दलील दी कि सरकारों को किसी भी स्थिति में प्रदर्शनकारियों के आगे ‘झुकना’ नहीं चाहिए। उन्होंने एक युवा की मौत का जिक्र करते हुए आशंका जताई कि यदि राष्ट्रीय राजधानी से जुड़े मामलों में सरकार इस तरह का लचीला रुख अपनाएगी, तो यह देश के अन्य राज्यों के लिए एक गलत मिसाल बन जाएगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि केंद्र या दिल्ली सरकार झुकती है, तो राजस्थान सरकार को भी दबाव में आकर छात्रों को खुश करने के लिए झुकना पड़ेगा। इसके अलावा उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कल यदि लखनऊ के किसी डिग्री कॉलेज के छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आएं और बसों पर पथराव जैसी हिंसा शुरू कर दें, तो क्या उत्तर प्रदेश सरकार को भी उनके आगे झुक जाना चाहिए?
अधिवक्ता की इन दलीलों और चिंताओं का संज्ञान लेते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि भले ही कुछ उपद्रवी या गुमराह तत्व पथराव जैसी हिंसक हरकतों या कानून-व्यवस्था को अपने हाथ में लेने की कोशिश में शामिल हों, फिर भी यह जरूरी है कि देश के युवाओं के साथ नरमी बरती जाए। अदालत ने दोहराया कि ऐसे युवाओं को सख्ती से कुचलने के बजाय उन्हें शांत करने, सही दिशा दिखाने और उनकी उचित काउंसलिंग करने की आवश्यकता है, ताकि स्थिति को और अधिक बिगड़ने से बचाया जा सके।