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उत्तर प्रदेश में कैसे फली-फूली नकल संस्कृति? SP शासनकाल की ढील बनाम योगी सरकार का सख्त नकल विरोधी कानून

आज के दौर में जब देश भर में पेपर लीक जैसी दुखद घटनाओं के संबंध में निर्णायक प्रक्रिया तय की जा रही है, तो उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के नौजवानों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर नकल संस्कृति की जड़ें कहां से शुरू हुईं और किस शासनकाल में पल्लवित-पुष्पित होते हुए इतनी बड़ी बेल बन गईं। उत्तर प्रदेश की बात इसलिए भी अत्यधिक प्रासंगिक है क्योंकि इस राज्य के अधिसंख्य युवा प्रतियोगी परीक्षाओं में अपना स्वर्णिम भविष्य देखते हैं। जब उनकी मेधा और योग्यता को उचित मंच नहीं मिल पाता, तो वे गहरी हताशा में चले जाते हैं। प्रदेश के युवाओं का भविष्य परीक्षा कक्ष के निष्पक्ष माहौल और भर्ती बोर्ड की पारदर्शी नीयत से ही तय होता है।

बीते तीन दशकों में इस राज्य ने परीक्षा और भर्ती के मोर्चे पर दो बिल्कुल विपरीत स्थितियां देखी हैं। एक समय समाजवादी पार्टी (SP) की सरकारों का दौर था, जब नकल को लगभग संस्थागत छत्रछाया मिली हुई थी और सरकारी भर्तियों में खुलेआम भाई-भतीजावाद चलता था। दूसरा दौर वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल का है, जब नकल माफिया की जड़ों पर देश का सबसे कठोर कानून बनाकर प्रहार किया गया। इन दोनों दौर की तुलनात्मक समीक्षा इसलिए जरूरी है क्योंकि यह उन लाखों अभ्यर्थियों की सांसों से जुड़ा सवाल है, जिनकी आने वाली जिंदगी एक परीक्षा के परिणाम पर टिकी होती है।

📜 1992 का नकल अध्यादेश और सपा सरकार की स्व-केंद्र (Self-Center) नीति से नकल माफिया का उदय

किसी भी सरकार का असली चरित्र उसके नीतिगत फैसलों से तय होता है। बात शुरू करने से पहले थोड़ा पीछे चलते हैं। 1992 से शुरू करते हैं, जब उत्तर प्रदेश में पहली बार ऐतिहासिक ‘नकल अध्यादेश’ लागू किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य परीक्षाओं में नकल पर पूरी तरह अंकुश लगाना था। लेकिन जैसे ही मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सरकार सत्ता में आई, इस कानून को व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी बना दिया गया। इसके साथ ही ‘स्व-केंद्र’ (सेल्फ-सेंटर) की नीति को लागू रखा गया, जिसके तहत विद्यार्थी अपने ही स्कूल/कॉलेज में परीक्षा दे सकते थे।

यह नीति देखने में तो एक सामान्य प्रशासनिक फैसला लगती है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बेहद घातक साबित हुए। इस नीति की आड़ में पूरे राज्यभर में एक समानांतर तंत्र खड़ा हो गया, जिसे बाद में लोग ‘नकल माफिया’ के नाम से जानने लगे। इस ढील का सीधा असर परीक्षा परिणामों पर भी दिखा। वर्ष 2004 में इंटरमीडिएट परीक्षा का परिणाम अचानक बेतहाशा ऊंचाई तक पहुंच गया, जो किसी भी सामान्य शैक्षणिक प्रगति के बजाय व्यवस्थागत ढील का ही परिणाम था। इसका सबसे दुखद पहलू यह रहा कि जो छात्र वर्षों कड़ी मेहनत करके योग्यता के आधार पर आगे बढ़ना चाहते थे, वे इस भीड़ में कहीं पीछे छूट गए, जबकि माफिया तंत्र की जेबें भरती रहीं। शिक्षा की नींव में यह खोखलापन आने वाले वर्षों तक राज्य को नुकसान पहुंचाता रहा।

⚖️ 2012 से 2017 के बीच गहराया संकट: मेडिकल-प्रशासनिक पर्चे लीक और भर्तियों में स्टिंग ऑपरेशन

अखिलेश यादव के नेतृत्व में जब समाजवादी पार्टी की सत्ता बनी, तो उम्मीद थी कि भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर कुछ सार्थक और सुधारात्मक फैसले लिए जाएंगे, लेकिन 2012 से 2017 के बीच स्थिति में सुधार आने के बजाय समस्या और गहरी होती चली गई। इस दौर में प्रतियोगी परीक्षाओं की गरिमा को बार-बार आघात पहुंचा। राज्य का शायद ही कोई बड़ा भर्ती बोर्ड ऐसा बचा हो, जिस पर धांधली या पेपर लीक के गंभीर आरोप न लगे हों।

मेडिकल प्रवेश परीक्षा का प्रश्नपत्र ट्रेजरी से ही लीक होने की अभूतपूर्व घटना ने लाखों अभ्यर्थियों के सपनों को झटका दिया और अंततः परीक्षा रद्द करनी पड़ी। इसी तरह प्रदेश की सबसे प्रतिष्ठित राज्य प्रशासनिक सेवा परीक्षा का पर्चा भी सोशल मीडिया के माध्यम से लीक हो गया, जिसके बाद भारी विरोध प्रदर्शनों के बीच परीक्षा को रद्द करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। ग्राम विकास अधिकारी (VDO) पद के लिए हो रही भर्ती प्रक्रिया में भी स्टिंग ऑपरेशन के माध्यम से रिश्वतखोरी का भंडाफोड़ हुआ, जिसमें सत्ताधारी दल से जुड़े प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता के दावे सामने आए।

💼 आजम खान के विभागों में सीधी भर्तियां और UPPSC पर लगे गंभीर जातिवादी पक्षपात के आरोप

यहां एक और गौरतलब बात यह है कि प्रदेश में जहां तमाम सरकारी विभागों की भर्तियां उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) व अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) के माध्यम से की जाती थीं, वहीं अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री आजम खान अपने विभागों में सभी भर्तियां खुद प्रत्यक्ष रूप से करते थे। उनके विभागों में तब धर्म विशेष के लोगों को नियम दरकिनार कर नौकरियां बांटे जाने के गंभीर आरोप लगे। भर्तियों में भाई-भतीजावाद सपा दौर की विशेष पहचान बन गया।

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग जैसी संवैधानिक संस्था, जिसकी निष्पक्षता किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है, उस पर भी गंभीर सवाल उठे। एक विशेष जाति-वर्ग के अभ्यर्थियों के चयन में असंगत बहुलता को लेकर उच्च न्यायालय (High Court) में जनहित याचिका तक दायर की गई, जिसमें चयन प्रक्रिया में भारी असंतुलन के आंकड़े प्रस्तुत किए गए। ऐसे आरोपों ने मेधावी और अन्य वर्गों से आने वाले अभ्यर्थियों में गहरा आक्रोश पैदा किया। इसी कड़ी में सिपाही और पीएसी (PAC) जवानों की भर्ती में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े, राजनीतिक सिफारिशों और रिश्वतखोरी के प्रमाण मिलने के बाद सरकार को जांच समिति गठित करनी पड़ी, जिसकी रिपोर्ट में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं और यह मामला वर्षों तक अदालतों में उलझा रहा।

🛡️ योगी सरकार में नीतिगत बदलाव: देश का सबसे कठोर ‘नकल विरोधी कानून’ और 1 करोड़ रुपये का जुर्माना

2017 के बाद जब हम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार के दृष्टिकोण की ओर देखते हैं, तो एक स्पष्ट नीतिगत और कानूनी बदलाव नजर आता है। योगी सरकार ने सत्ता में आने के बाद परीक्षा प्रणाली में व्याप्त अराजकता को एक गंभीर प्रशासनिक चुनौती के रूप में स्वीकार किया और इसके समाधान के लिए कड़े कानूनी हस्तक्षेप का रास्ता चुना। इसी सोच का नतीजा रहा—उत्तर प्रदेश लोक सेवा (प्रतियोगी परीक्षा) अनुचित साधनों की रोकथाम अधिनियम

यह कानून देश के सबसे कठोर प्रावधानों में गिना जाता है, जिसमें:

  • सजा का प्रावधान: पेपर लीक कराने वाले या संगठित नकल में संलिप्त पाए जाने वाले दोषियों के लिए आजीवन कारावास तक की सजा।

  • आर्थिक दंड: दोषियों पर 1 करोड़ रुपये तक का भारी जुर्माना

  • कड़ी संपत्ति कार्रवाई: दोषी पाई जाने वाली परीक्षा संचालन एजेंसियों/माफिया की संपत्ति कुर्क करने और उनसे परीक्षा आयोजन की पूरी लागत वसूलने का कानून।

इसके साथ ही प्रशासनिक स्तर पर सीसीटीवी (CCTV) निगरानी अनिवार्य की गई, संवेदनशील परीक्षा केंद्रों को बाहर किया गया और प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए बहु-स्तरीय व्यवस्था लागू की गई।

📊 दोनों दौर का तुलनात्मक निष्कर्ष: पारदर्शिता से ही सुरक्षित होगा युवाओं का भविष्य

दोनों दौर की तुलना से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि सपा के दौर में परीक्षा प्रणाली को ढीला छोड़कर नकल को लगभग परोक्ष संरक्षण दिया गया और भर्तियों में जातिगत तथा राजनीतिक निकटता को प्रभावी माना गया। वहीं, योगी सरकार में कानूनी सख्ती और बुलडोजर/कुर्की जैसी कठोर दंडात्मक कार्रवाइयों के माध्यम से इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का प्रयास किया गया। जब परीक्षा और भर्ती प्रणाली पूरी तरह निष्पक्ष एवं पारदर्शी होती है, तभी वास्तविक अर्थों में युवाओं की मेधा को उनका हक मिलता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के स्वर्णिम भविष्य के लिए यह पारदर्शिता बनी रहना अत्यंत आवश्यक है।