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अरुणाचल के वर्षावनों में जैव-विविधता की नई खोज

पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध प्राकृतिक विरासत पर वैश्विक ध्यान

  • मेंढकों की आवाजों से वैज्ञानिक सुराग

  • मेंढ़कों पर केंद्रित पहला ध्वनिक अध्ययन

  • जैव विविधता के हॉट स्पॉट है यह इलाका

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटी: पूर्वोत्तर भारत का पूर्वी हिमालय और इंडो-बर्मा क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव-विविधता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। हाल ही में, अरुणाचल प्रदेश के नमदाफा टाइगर रिज़र्व में वैज्ञानिकों ने मेंढकों की लुप्तप्राय और दुर्लभ प्रजातियों का पता लगाने के लिए पैसिव अकूस्टिक मॉनिटरिंग (पीएएम) तकनीक का सफल उपयोग किया है। वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के शोधकर्ताओं द्वारा की गई यह अपनी तरह की अनूठी स्टडी, जर्नल हर्पेटोज़ोआ में प्रकाशित हुई है।

नमदाफा के घने और दुर्गम रेनफॉरेस्ट में पारंपरिक रूप से पैदल चलकर किए जाने वाले सर्वे (विज़ुअल एनकाउंटर सर्वे) अत्यंत कठिन होते हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने जंगलों और जल निकायों में ऑटोमेटेड साउंड रिकॉर्डर लगाए। इस तकनीक के माध्यम से उन मेंढकों को भी पहचान लिया गया, जो पेड़ की छतरियों, पत्तों के नीचे या बिलों में छिपे रहते हैं और अक्सर पारंपरिक सर्वे में छूट जाते हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया कि सिर्फ ध्वनिक (अकूस्टिक) मॉनिटरिंग से 11 एंडेमिक प्रजातियों का पता चला। इतना ही नहीं, रिकॉर्ड की गई अनजानी आवाज़ों के विश्लेषण से लिम्नोनेक्टेस मोतीझील और राओर्चेस्टेस नासुटा जैसी नई प्रजातियों की खोज संभव हो सकी।

शोध का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि पैसिव अकूस्टिक मॉनिटरिंग और पारंपरिक विज़ुअल सर्वे का मिला-जुला उपयोग एम्फीबियन विविधता को समझने का सबसे प्रभावी तरीका है। दोनों विधियों को एक साथ इस्तेमाल करने से 23 प्रजातियों का पता चला, जो अकेले उपयोग करने की तुलना में 21 प्रतिशत अधिक है।

एम्फीबियन दुनिया के सबसे खतरे में पड़े जीवों में से हैं और जलवायु परिवर्तन उनके अस्तित्व के लिए बड़ा जोखिम है। भारत में अभी तक इनके लिए कोई औपचारिक मॉनिटरिंग प्रोटोकॉल नहीं है। यह अध्ययन सिद्ध करता है कि ऑटोमेटेड रिकॉर्डर दूरस्थ और दुर्गम इलाकों में कम लागत और लंबे समय तक निगरानी के लिए एक व्यावहारिक विकल्प हैं। यह तकनीक न केवल प्रजातियों को खोजने में सक्षम है, बल्कि नमदाफा जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में भविष्य के संरक्षण कार्यों के लिए भी एक नई दिशा प्रदान करती है।