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शून्य से बंगाल का सबसे बड़ा संसदीय दल

रातोंरात चर्चा के केंद्र में आ गयी एनसीपीआई पार्टी

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में मची टूट अब अपने चरम पर पहुँच गई है। सोमवार को सामने आए एक चौंकाने वाले घटनाक्रम में, पार्टी के 20 बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में अपने विलय की घोषणा की है। इस विलय के साथ ही, एनसीपीआई ने दावा किया है कि वह अब पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा संसदीय गुट बन गया है।

लोकसभा में 42 सीटों वाले पश्चिम बंगाल में अब राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। बागी सांसदों ने दल-बदल विरोधी कानून के दायरे से बचने के लिए एक सोची-समझी रणनीति के तहत यह विलय किया है। इन सांसदों ने पिछले ही दिन नई दिल्ली में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अपनी नई राजनीतिक स्थिति से अवगत कराया। विलय के बाद एनसीपीआई के पास अब 20 सांसद हो गए हैं, जबकि टीएमसी के पास मात्र 8 सांसद बचे हैं।

हावड़ा के संकराइल स्थित अपने पंजीकृत कार्यालय से सोशल मीडिया पर जारी बयान में एनसीपीआई ने कहा, 20 लोकसभा सीटों के साथ, एनसीपीआई अब पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी संसदीय शक्ति बनकर उभरी है, जो राष्ट्रीय स्तर पर राज्य की आवाज़ बनेगी। पार्टी के राष्ट्रीय आयोजन सचिव, शांतनु डे ने इस घटनाक्रम पर प्रसन्नता जताते हुए कहा, हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हैं और एनडीए के एक सहयोगी के रूप में काम करने के इच्छुक हैं। उन्होंने बागी गुट की वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तीदार के माध्यम से चर्चा की संभावना भी जताई है।

जहाँ एक ओर यह विलय सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर एनसीपीआई की कार्यप्रणाली पर सवाल भी उठने लगे हैं। हावड़ा के जिस पते को पार्टी अपना मुख्यालय बता रही है, वह एक स्थानीय दंपत्ति, उत्तमिया कुंडू और शेवली कुंडू का घर है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, यहाँ से एक एनजीओ चलाया जाता है। 2023 के पंचायत चुनावों में इस पार्टी के सभी उम्मीदवार हार गए थे, जिसके कारण इसकी अचानक मिली इस संसदीय ताकत पर राजनीतिक विश्लेषक संदेह जता रहे हैं।

तृणमूल कांग्रेस के वफादार खेमे ने इस विलय को विश्वासघात करार दिया है। पार्टी नेतृत्व ने इसे संवैधानिक रूप से अवैध बताते हुए लोकसभा अध्यक्ष से हस्तक्षेप की मांग की है और कहा है कि वे इन सांसदों की सदस्यता रद्द करने के लिए कानूनी कदम उठाएंगे। फिलहाल, इस घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल मचा दी है और आने वाले संसद सत्र के दौरान फ्लोर टेस्ट और संसदीय मानकीकरण पर बड़ी बहस छिड़ने के आसार हैं।