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राम मंदिर दान घोटाला लंबे समय से जारी

वर्चस्व की लड़ाई की वजह से खुलता गया असली राज

  • टिन्नू के दबदबे से नाराज था एक गुट

  • विहिप के पुराने लोग भी खार खाये थे

  • एक की तलाशी के बाद सारे नाम आये

राष्ट्रीय खबर

लखनऊः अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दानपात्रों की धनराशि में हेराफेरी का मामला इन दिनों न केवल धार्मिक बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का मुख्य केंद्र बना हुआ है। यह घोटाला शायद कभी सार्वजनिक नहीं हो पाता, यदि इसके पीछे काम करने वाले सूत्रधारों के मन में मंदिर प्रबंधन के प्रति अपना दबदबा बढ़ाने की तीव्र इच्छा न होती। दरअसल, यह पूरा प्रकरण दान की चोरी से अधिक मंदिर प्रबंधन में मचे वर्चस्व के आंतरिक संघर्ष की परिणति है।

मामले की जड़ में मंदिर ट्रस्ट के एक पदाधिकारी के पूर्व ड्राइवर रहे रामशंकर यादव, जिसे टिन्नू के नाम से जाना जाता है, का बढ़ता कद है। टिन्नू का हस्तक्षेप इतना बढ़ गया था कि वह मंदिर के दैनिक प्रबंधन से लेकर परिसर में आयोजित होने वाले बड़े आयोजनों की बागडोर भी संभालने लगा था। इस स्थिति ने उन लोगों में असंतोष पैदा कर दिया जो लंबे समय से विश्व हिंदू परिषद (विहिप) से जुड़े थे और ट्रस्ट की व्यवस्था में अपनी पुरानी धाक जमाए हुए थे। उन्हें लगा कि एक अदना सा ड्राइवर उनकी महत्ता को चुनौती दे रहा है।

इसी खींचतान के बीच, टिन्नू विरोधी धड़े के मुखिया को मंदिर में दान की गणना के दौरान चोरी की भनक लगी। उन्होंने इसे एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का मन बनाया। पांच जून की दोपहर को सुनियोजित तरीके से ट्रस्ट पदाधिकारी को मौके पर बुलाया गया। यात्री सुविधा केंद्र में अचानक हुई इस दबिश के दौरान एक गणना कर्मी की तलाशी ली गई, जिसमें नकदी बरामद हुई। इसके बाद पूछताछ का सिलसिला चला, जिसमें अनुकल्प मिश्र, लवकुश, अविनाश शुक्ला और राजेश पाठक जैसे नाम सामने आए। यहां तक कि बाथरूम से भी भारी मात्रा में नकदी मिलने के बाद ट्रस्टी स्तब्ध रह गए।

घटना के तुरंत बाद ट्रस्ट पदाधिकारी अत्यंत आक्रोशित हुए और प्राथमिकी दर्ज कराने की बात कही, लेकिन कुछ प्रभावशाली फोन कॉल्स के दबाव के चलते मामला ठंडा पड़ गया। यह निर्णय लिया गया कि कानूनी पचड़े से बचने के लिए अंदरूनी पूछताछ कर धनराशि वापस ले ली जाए। परंतु, टिन्नू विरोधी गुट, जो पहले से ही अपनी उपेक्षा से आहत था, ने इस पूरी गोपनीय रणनीति को बाहर उजागर कर दिया। मामला समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव तक पहुँचा और उनके सोशल मीडिया पोस्ट ने इसे सुर्खियां बना दिया।

यह स्पष्ट है कि दानपात्र में सेंध केवल पैसों की लालच नहीं, बल्कि मंदिर की व्यवस्था को नियंत्रित करने की एक सोची-समझी राजनीतिक चाल थी। अब जांच एजेंसियों की नजर इस पर है कि आखिर दान की यह चोरी कितने समय से चल रही थी और इसके पीछे और कौन से बड़े चेहरे छिपे हैं।