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रांची के रेस्त्रराओं में भी मेनू घटे और दाम बढ़े

रसोई गैस की कीमतों का जनता पर असर

  • कॉमर्शियल सिलेंडर महंगे हुए है

  • रेस्त्रराओं पर इसका असर पड़ा है

  • ठेलों तक में अब दाम बढ़ गये हैं

राष्ट्रीय खबर

रांची: झारखंड की राजधानी रांची में व्यावसायिक रसोई गैस के दामों में हुई अप्रत्याशित वृद्धि ने शहर की आर्थिक लय बिगाड़ दी है। गैस की मौजूदा कमी के बीच कीमतों में इस भारी बढ़ोतरी ने न केवल व्यापारियों बल्कि आम उपभोक्ताओं के लिए भी एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। विशेष रूप से 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल सिलेंडर की रिफिल दर में करीब 994 रुपये का इजाफा देखा गया है, जिसके बाद अब इसकी कीमत 2256 रुपये 50 पैसे तक पहुंच गई है। ऊर्जा लागत में आई इस तगड़ी तेजी का सीधा असर अब लोगों की थाली पर पड़ने लगा है।

शहर के होटल और रेस्टोरेंट संचालकों के अनुसार, ईंधन की कीमतों में इस तरह की बेतहाशा वृद्धि के कारण उनके पास भोजन के दाम बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले दिनों में होटलों में मिलने वाले खाद्य पदार्थों की कीमतों में 10 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। संचालकों का कहना है कि लागत मूल्य बढ़ने के कारण वे पहले ही मामूली वृद्धि कर चुके थे, लेकिन गैस सिलेंडर के दाम दोगुने के करीब पहुंचने से अब एक बड़ा आर्थिक बदलाव अनिवार्य हो गया है। कई रेस्टोरेंट ने अब ऐसे व्यंजनों को कम बनाना शुरू कर दिया है जिनमें गैस की खपत अधिक होती है।

महंगाई की इस मार का सबसे दर्दनाक पहलू उन लोगों से जुड़ा है जो शिक्षा या रोजगार के सिलसिले में दूसरे शहरों से आकर रांची में बसे हैं। किराये के कमरों में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र और दिहाड़ी मजदूर, जो पूरी तरह बाहरी खान-पान (स्ट्रीट फूड या छोटे होटलों) पर निर्भर रहते हैं, उनके लिए अब गुजारा करना मुश्किल हो रहा है। छोटे सिलेंडरों की कीमतों में भी 260 रुपये की वृद्धि हुई है, जिससे मेस और टिफिन सेवाओं के दाम भी बढ़ गए हैं।

आपूर्ति संकट और वैश्विक प्रभाव गैस की किल्लत और कीमतों में वृद्धि के पीछे वैश्विक राजनीतिक अस्थिरता, विशेषकर ईरान युद्ध की परिस्थितियों को एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। तेल कंपनियों द्वारा आपूर्ति में की गई कटौती का असर रांची की सड़कों पर साफ देखा जा सकता है। ईंधन की अनुपलब्धता और महंगी लागत के कारण शहर की कई स्ट्रीट फूड की दुकानें बंद होने के कगार पर पहुंच गई हैं। यह स्थिति न केवल व्यवसाय जगत के लिए चिंताजनक है, बल्कि यह एक बड़े सामाजिक-आर्थिक संकट की ओर भी इशारा कर रही है।