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बीमा क्षेत्र में 100 फीसद एफडीआई को केंद्र की मंजूरी

एलआईसी और आम उपभोक्ताओं को इसे समझना होगा

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने शनिवार को एक ऐतिहासिक नीतिगत कदम उठाते हुए भारतीय बीमा कंपनियों में ऑटोमैटिक रूट के माध्यम से 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को औपचारिक रूप से अधिसूचित कर दिया है। 2 मई को भारत के राजपत्र में प्रकाशित विदेशी मुद्रा प्रबंधन (गैर-ऋण उपकरण) (द्वितीय संशोधन) नियम, 2026 के माध्यम से यह निर्णय लिया गया है।

संशोधित नियमों के तहत विदेशी निवेश के लिए तीन अलग-अलग श्रेणियां बनाई गई हैं। निजी बीमा कंपनियां: अब इन कंपनियों में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति है। इसका अर्थ है कि एक विदेशी कंपनी अब बिना सरकार की पूर्व अनुमति के किसी भारतीय बीमा फर्म का पूर्ण स्वामित्व प्राप्त कर सकती है, हालांकि यह भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) के सत्यापन के अधीन होगा।

एलआईसी को एक अलग और प्रतिबंधित श्रेणी में रखा गया है। एलआईसी में विदेशी निवेश की सीमा अभी भी ऑटोमैटिक रूट के माध्यम से मात्र 20 प्रतिशत पर सीमित रखी गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि एलआईसी का प्रबंधन एलआईसी अधिनियम, 1956 के तहत ही रहेगा। बीमा ब्रोकर, सलाहकार, कॉर्पोरेट एजेंट और सर्वेक्षक जैसी श्रेणियों में भी अब 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति दे दी गई है।

ऑटोमैटिक रूट का अर्थ यह है कि किसी विदेशी निवेशक को भारत में निवेश करने से पहले सरकार या आरबीआई से अग्रिम अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। यह प्रक्रिया सरकारी रूट की तुलना में कहीं अधिक तेज है, जिसमें अंतर-मंत्रालयी मंजूरी में महीनों लग जाते थे। उदारीकरण के साथ सरकार ने भारतीय हितों की रक्षा के लिए कुछ शर्तें भी रखी हैं। विदेशी निवेश वाली किसी भी बीमा कंपनी में अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक या मुख्य कार्यकारी अधिकारी में से कम से कम एक का निवासी भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है। शेयरों का अधिग्रहण वास्तविक मूल्यांकन पर ही होगा, ताकि विदेशी निवेशक कृत्रिम रूप से कम कीमतों पर हिस्सेदारी न खरीद सकें।

विदेशी स्वामित्व वाले मध्यस्थों को अपने समूह की कंपनियों या सहयोगियों को किए गए सभी भुगतानों का पूरा खुलासा करना होगा। भारत में बीमा पैठ अभी भी वैश्विक औसत से काफी नीचे है। 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति से वैश्विक बीमा दिग्गजों के भारत आने की संभावना है, जो अब तक भारतीय साझेदारों के साथ संयुक्त उद्यम के माध्यम से काम कर रहे थे।

भारतीय उपभोक्ताओं के लिए, बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा का अर्थ है—बेहतर बीमा उत्पाद, दावों का तेजी से निपटान, व्यापक भौगोलिक पहुंच और प्रतिस्पर्धी कीमतें। निजी क्षेत्र के लिए यह अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है, जिससे इस क्षेत्र में वैश्विक पूंजी और आधुनिक तकनीक का प्रवाह बढ़ेगा।