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अमेरिकी की हां और ईरान की औपचारिक ना से भ्रम की स्थिति

आखिर युद्धविराम पर बात हो रही है या नहीं

वाशिंगटनः राष्ट्रपति ट्रंप के लिए इस समय बातचीत की खबर फैलाना एक आर्थिक और राजनीतिक ढाल है। युद्ध के कारण तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं। बातचीत की खबर मात्र से शेयर बाजार और तेल की कीमतों में स्थिरता आती है, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।

अमेरिका में चुनाव करीब हैं। ट्रंप इस युद्ध को एक छोटी सैन्य कार्रवाई के रूप में पेश करना चाहते थे, लेकिन अब यह खिंचता जा रहा है। बातचीत का दावा उन्हें एक डील-मेकर के रूप में दिखाता है जो संकट टाल सकता है। बातचीत का शोर मचाकर अमेरिका को अपनी सैन्य स्थिति मजबूत करने और अतिरिक्त सैनिकों को क्षेत्र में भेजने का समय मिल जाता है।

ईरान के लिए बातचीत से इनकार करना उसकी प्रतिरोध रणनीति का हिस्सा है। ईरान चाहता है कि अमेरिका और वैश्विक अर्थव्यवस्था इस युद्ध की कीमत चुकाए। यदि वे बातचीत स्वीकार कर लेते हैं, तो बाजार शांत हो जाएगा और अमेरिका पर दबाव कम हो जाएगा। ईरानी अधिकारी, विशेषकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ, इसे फेक न्यूज कहकर यह संदेश दे रहे हैं कि वे झुकने वाले नहीं हैं।

वे अमेरिका को उस दलदल में फँसाए रखना चाहते हैं जिसमें वह घुस चुका है। ईरान को लगता है कि इजरायल के मिसाइल डिफेंस (इंटरसेप्टर) का स्टॉक कम हो रहा है। ऐसे में युद्ध जारी रखकर वे ज्यादा प्रभावी चोट पहुँचा सकते हैं।

पूरी संभावना है कि पर्दे के पीछे बैक-चैनल (गुप्त) बातचीत हो रही होगी, लेकिन आधिकारिक तौर पर कोई भी पक्ष इसे स्वीकार नहीं करना चाहता। ट्रंप इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं ताकि बाजार को संभाला जा सके। ईरान इसे पूरी तरह नकार रहा है ताकि वह अमेरिका पर आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए रख सके। ईरान द्वारा अमेरिकी तेल प्रतिबंधों में छूट प्राप्त करना यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं कुछ लेन-देन या मजबूरी वाली बातचीत तो हुई है, भले ही वह मेज पर बैठकर की गई औपचारिक वार्ता न हो।