असम भाजपा में पूर्व अध्यक्ष सहित उन्नीस के टिकट कटे
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भट्टाचार्य ही बने थे हिमंता के सारथी
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रिजिजू और सोनोवाल का तेज विरोध
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इस बार दलबदलुओं की मिली तरजीह
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः असम भाजपा के अंदर के असंतोष से दिल्ली दरबार चिंतित है। असम की राजनीति में एक दशक पहले जिस व्यक्ति ने मौजूदा मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के लिए भाजपा के दरवाजे खोले थे, आज वही नेता हाशिये पर नजर आ रहा है। असम भाजपा के पूर्व अध्यक्ष सिद्धार्थ भट्टाचार्य उन 19 मौजूदा विधायकों में शामिल हैं, जिन्हें पार्टी ने 9 अप्रैल को होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों के लिए टिकट देने से इनकार कर दिया है। 19 मार्च को जारी भाजपा की उम्मीदवार सूची ने न केवल पुराने दिग्गजों को चौंका दिया है, बल्कि पार्टी के भीतर पुराने बनाम नए की एक बड़ी बहस छेड़ दी है।
यह विडंबना ही है कि 23 अगस्त 2015 को सिद्धार्थ भट्टाचार्य ही वह व्यक्ति थे, जो तत्कालीन कांग्रेस दिग्गज हिमंत बिस्वा सरमा को अमित शाह के दिल्ली स्थित आवास पर ले गए थे। उस समय भट्टाचार्य असम भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे। उन्होंने उस समय सरमा की राह में आ रही बाधाओं को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, खासकर तब जब सर्बानंद सोनोवाल और किरेन रिजिजू जैसे नेताओं ने सरमा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर उनकी एंट्री का विरोध किया था। 25 अगस्त 2015 को जब सरमा औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हुए, तब भट्टाचार्य ने ही उनका हाथ हवा में उठाकर जनता के सामने पेश किया था।
एक दशक बाद, जब राज्य में हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जा रहा है, भट्टाचार्य को दरकिनार कर दिया गया है। हालांकि भट्टाचार्य ने संयमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे पार्टी से नाराज नहीं हैं, लेकिन अन्य वरिष्ठ नेताओं का गुस्सा फूट पड़ा है। सबसे ज्यादा नाराजगी दिसपुर विधानसभा क्षेत्र को लेकर है, जहाँ से पांच बार के विधायक और पूर्व मंत्री अतुल बोरा का टिकट काट दिया गया है। बोरा की जगह कांग्रेस से आए प्रद्युत बोरदोलोई को मैदान में उतारा गया है, जो हाल ही में भाजपा में शामिल हुए हैं।
कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले नेताओं को टिकट मिलने से पार्टी के समर्पित और पुराने कार्यकर्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। अतुल बोरा जैसे नेताओं ने संकेत दिया है कि वे या तो निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे या विपक्षी उम्मीदवार का समर्थन करेंगे। भाजपा के भीतर यह दरार चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि पुराने गार्ड का मानना है कि जिन लोगों के खिलाफ वे सालों तक लड़े, अब उन्हीं के नीचे उन्हें काम करना पड़ रहा है। असम के सत्ता गलियारों में इसे हिमंत युग का पूर्ण प्रभुत्व माना जा रहा है, जहाँ पुराने सांगठनिक ढांचों की जगह नई चुनावी रणनीतियों को प्राथमिकता दी जा रही है।