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अब ‘आवाज’ से खुलेगा प्रदूषण का राज! दिल्ली समेत 9 राज्यों में लगा स्वदेशी ‘SODAR’ सिस्टम; हवा के हर दुश्मन पर रखेगा पैनी नजर

भोपाल: प्रदूषण की स्थिति और मौसम की सटीक जानकारी जुटाने के लिए CSIR-EMPRI (Advanced Materials and Processes Research Institute) भोपाल द्वारा तैयार किया गया स्वदेशी सिस्टम हिट साबित हुआ है. पिछले 4 माह के दौरान दिल्ली सहित 9 राज्यों में इसे लगाया जा चुका है. जल्द ही मध्य प्रदेश मौसम विज्ञान केन्द्र में भी इसे स्थापित किया जा रहा है.

एम्प्री द्वारा तैयार किए गए सोडार यानी सोनिक डिटेक्शन एंड रैंगिंग एक ग्राउंड बेस्ड रिमोट सेंसिंग डिवाइस है. इस डिवाइस से सतह से 100 मीटर तक की हवा की निगरानी कर सकते हैं. इसमें आने वाले बदलावों की सूचना इस डिवाइस से आसानी से मिल जाती है.

100 मीटर और उससे अधिक ऊंचाई की सटीक जानकारी

सीएसआईआर एम्प्री भोपाल के निदेशक प्रो थल्लाडा भास्कर बताते हैं कि “प्रदूषण के स्तर और मौसम की सटीक जानकारी देने के लिए तैयार की गई स्वदेशी तकनीक हिट साबित हुई है. यह सोडार सिस्टम ध्वनि रिमोट सेंसिंग तकनीक हैं. सरल शब्दों में कहें तो इस सिस्टम से जमीन से 100 मीटर ऊंचाई की ध्वनि तरंगों के माध्यम से वायुमंडलीय सीमा परत की ऊंचाई और थर्मल संरचनाओं की निगरानी की जाती है.

इसकी मदद से कई 100 मीटर ऊपर तक हवा में होने वाले बदलावों, इसमें होने वाले मिश्रण और तापमान में होने वाले बदलावों का डेटा प्राप्त किया जाता है. इसके बाद इस डेटा का अध्ययन कर प्रदूषण के स्तर और मौसम की जानकारी का पता लगाना बहुत आसान हो जाता है.”

‘हवा की गति से मिल रहे संकेत’

डायरेक्टर प्रो थल्लाडा भास्कर कहते हैं कि “इस सिस्टम के जरिए पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव, मिक्सिंग हाइट तक वायु की गति में होने वाले बदलावों का आंकलन आसान हो गया है. इस सिस्टम की मदद से पहले के मुकाबले सटीक डाटा मिल रहे हैं. औद्योगिक क्षेत्रों में फैक्ट्रियों में चिमनियों से निकलने वाला धुंआ कितना प्रदूषण फैला रहा है, इसका डाटा जुटाना आसान हुआ है.

इसके अलावा तापमान में होने वाले बदलावों और मौसम के पूर्वानुमान का अध्ययन करने में इससे मिलने वाले डाटा ज्यादा सटीक साबित हो रहे हैं. यही वजह है कि पिछले 4 माह के दौरान ही 9 राज्यों में इसे लगाया जा चुका है.”

इस तरह सोडार सिस्टम करता है काम

सोडार प्रणाली ध्वनि और उच्च शक्ति वाली तरंगों को वातावरण में भेजती है. 1 किलो हॉर्ट्स से 4 किलो हॉर्ट्स तक की फ्रीक्वेंसी को नियमित अंतराल पर 1 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर भेजा जाता है. जब यह ध्वनि तरंगे आसमान में तापमान और हवा की हलचल में टकराती हैं और टकराकर फिर वापस लौटती हैं. इस ईको को एंटीना की मदद से वापस रिसीव किया जाता है. इसका कम्प्यूटर के जरिए एनालिसिस किया जाता है. इससे पता चलता है कि हवा की गति और हवा में प्रदूषण का स्तर कितना है.

4 माह में 9 राज्यों ने अपनाया

इस सिस्टम की सटीकता के चलते इसे पिछले 4 माह में 9 राज्य अपना चुके हैं. यह सेंट्रल पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड नई दिल्ली में लगाया जा चुका है. इसके अलावा राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला, नई दिल्ली, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़, राजस्थान पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड, अलवर, पंजाब पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रूड़की, भारत मौसम विज्ञान विभाग, हिसार, महाराष्ट्र पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड, मुंबई, टाटा स्टील जमशेदपुर और भारत मौसम केन्द्र नई दिल्ली में इसे लगाया जा चुका है. जल्द ही भोपाल के मौसम विज्ञान केन्द्र में भी इसे लगाए जाने की तैयार की जा रही है.