सरकार की इच्छा के खिलाफ पांच मई से सुनवाई
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उत्तर पूर्व के राज्यों का मामला अलग
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असम समझौता का भी उल्लेख किया
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भाजपा शासित राज्यों को परेशानी
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की तिथि निर्धारित कर दी है। गुरुवार को शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि इन याचिकाओं पर 5 मई, 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में नियमित सुनवाई की जाएगी। भारत के मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने प्रक्रियात्मक निर्देश जारी करने के लिए इन याचिकाओं पर विचार किया। गौरतलब है कि यह मामला लगभग दो साल बाद (पिछली बार 19 मार्च, 2024 को) सूचीबद्ध किया गया है।
न्यायालय ने सुनवाई के लिए एक विस्तृत समय सारिणी तय की है। 5 मई और 6 मई (आधा दिन): याचिकाकर्ताओं का पक्ष सुना जाएगा। 6 मई (दोपहर बाद) और 7 मई: सरकार (प्रतिवादी) की दलीलें सुनी जाएंगी। 12 मई: प्रत्युत्तर प्रस्तुत करने के लिए समय दिया गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अनुरोध किया कि असम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों से संबंधित याचिकाओं पर अलग से विचार किया जाए, क्योंकि वहां की चुनौतियां नागरिकता अधिनियम की धारा 6 ए और इनर लाइन परमिट जैसे विशेष मुद्दों से जुड़ी हैं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कोर्ट को सूचित किया कि जनवरी 2020 के आदेश के अनुसार, असम और त्रिपुरा के मामलों को अलग श्रेणी में रखा गया है। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि पहले शेष भारत से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई होगी, उसके बाद असम और त्रिपुरा के विशेष मुद्दों को लिया जाएगा।
नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 उन गैर-मुस्लिम प्रवासियों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) को भारतीय नागरिकता प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से उत्पीड़न के कारण 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मुसलमानों को इस श्रेणी से बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
असम के याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून 1985 के असम समझौते की शर्तों के विरुद्ध है। यह भी तर्क दिया गया है कि कानून केवल तीन पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों की बात करता है, जबकि अन्य देशों के शरणार्थियों की अनदेखी की गई है। केंद्र सरकार ने अधिनियम का बचाव करते हुए कहा है कि यह कानून किसी भी वर्तमान भारतीय नागरिक की नागरिकता को प्रभावित नहीं करता है। सरकार का तर्क है कि किसी विशेष समूह को रियायत देने के लिए अंडर-इंक्लूजन (कुछ समूहों का शामिल न होना) अपने आप में अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।