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अस्पष्ट व्यापार समझौता का परिणाण अनिश्चित

आशावाद के पीछे का धुंधलका भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हाल ही में संपन्न हुए अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर सरकारी गलियारों और बाजारों में एक प्रकार का उत्साह देखा जा रहा है। लंबे समय तक चली थकाऊ वार्ताओं के बाद, यह समझौता अंततः एक राहत के रूप में सामने आया है।

हालांकि, यदि इस समझौते के प्रावधानों की बारीकी से जांच की जाए, तो इसमें एक ऐसी असममितता या असंतुलन नजर आता है जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन है। सरकार इसे एक विन-विन (दोनों पक्षों की जीत) सौदा बता रही है, लेकिन कूटनीतिक और आर्थिक विशेषज्ञों के मन में कई असहज करने वाले सवाल उठने लगे हैं। प्रशुल्क और व्यापार असंतुलन का संकट इस समझौते के सबसे विवादास्पद पहलुओं में से एक प्रशुल्क ढांचा है।

संयुक्त बयान के अनुसार, भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और खाद्य एवं कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर आयात शुल्क को पूरी तरह समाप्त करने या काफी हद तक कम करने पर सहमत हो गया है। इसके विपरीत, अमेरिका भारत से होने वाले आयात पर 18 प्रतिशत का भारी शुल्क लगाना जारी रखेगा।

यह प्रावधान स्पष्ट रूप से अमेरिका के पक्ष में झुका हुआ प्रतीत होता है। अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि यह समझौता व्यापारिक या कानूनी अर्थों में एक पूर्ण व्यापार सौदा नहीं है, बल्कि केवल वार्ताओं के बीच एक अस्थायी विराम का संकेत देता है। इससे भविष्य की व्यापारिक अनिश्चितता खत्म होने के बजाय और अधिक उलझ गई है।

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भारतीय किसानों की चिंताओं को दूर करने का प्रयास करते हुए दावा किया है कि मांस, पोल्ट्री, डेयरी, जीएम (जीन संवर्धित) खाद्य उत्पाद, चावल, गेहूं, दालें और चीनी जैसे संवेदनशील उत्पादों को इस ढांचे से बाहर रखा गया है। सरकार का कहना है कि उन्होंने अन्नदाता के हितों की रक्षा की है।

परंतु, किसान संगठनों की आशंकाएं इसके उलट हैं। उन्हें डर है कि अमेरिका से सेब, सोयाबीन तेल और सूखे अनाज जैसे उत्पादों के बड़े पैमाने पर आयात की अनुमति देने से भारतीय बाजार में कीमतों में गिरावट आएगी। भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था पहले से ही जलवायु परिवर्तन और कर्ज के बोझ के कारण अनिश्चित स्थिति में है। ऐसे में अमेरिकी उत्पादों के लिए दरवाजे खोलना छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका को खतरे में डाल सकता है। देश के विभिन्न हिस्सों में किसान संगठनों ने इस समझौते के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं।

रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा सुरक्षा पर प्रहार वर्तमान में भारत का अमेरिका के साथ 40 बिलियन डॉलर से अधिक का व्यापार अधिशेष है। लेकिन अगले पांच वर्षों में 500 बिलियन डॉलर मूल्य की अमेरिकी वस्तुओं और उत्पादों को खरीदने की प्रतिबद्धता इस संतुलन को बिगाड़ सकती है। सबसे चौंकाने वाली बात रूसी तेल को लेकर है।

रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने इस समझौते के एक हिस्से के रूप में रूस से तेल खरीदना बंद करने का वादा किया है। हालांकि, सार्वजनिक किए गए आधिकारिक पाठ में इसका सीधा उल्लेख नहीं है, लेकिन कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि भारत के तेल आयात की निगरानी की जाएगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इस शर्त का पालन किया जा रहा है।

यदि यह सच है, तो यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए एक बड़ा झटका है। शीत युद्ध के समय से ही भारत अपनी विदेश नीति को स्वतंत्र रखने के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन तेल खरीद पर अमेरिकी शर्तों को मानना हमारी संप्रभुता के साथ समझौता करने जैसा है। ट्रंप प्रशासन की अनिश्चितता और पारदर्शिता का अभाव सरकार का दावा है कि ये रियायतें केवल विश्वास-निर्माण के उपाय हैं और भविष्य में एक अधिक व्यापक और बेहतर शर्तों वाला व्यापार समझौता किया जाएगा। लेकिन यहाँ वास्तविकता और उम्मीदों के बीच एक बड़ी खाई है।

डोनाल्ड ट्रंप और उनका प्रशासन अपने मनमाने और स्वार्थी फैसलों के लिए कुख्यात रहा है। समझौते के कई हिस्सों में पारदर्शिता की भारी कमी खटकती है। सरकार ने अब तक इस सौदे के विवादास्पद बिंदुओं पर स्पष्टता और दृढ़ता के साथ जवाब नहीं दिया है। गुप्त समझौतों और मौखिक वादों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार का संचालन करना जोखिम भरा हो सकता है।

क्या यह समझौता भारत के लिए सही है? अंततः, भारत-अमेरिका का यह अंतरिम समझौता एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ लाभ कम और जोखिम अधिक नजर आते हैं। बाजार को अल्पकालिक राहत जरूर मिली है, लेकिन लंबी अवधि में भारतीय किसानों, रणनीतिक स्वायत्तता और व्यापार संतुलन पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। सरकार को चाहिए कि वह इस समझौते की बारीकियों को सार्वजनिक करे और यह सुनिश्चित करे कि दोस्ती के नाम पर भारत के आर्थिक हितों की बलि न चढ़े।