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कानून के दुरुपयोग पर भी अंकुश लगे

कानून की कठोरता और न्याय की मंथर गति भारतीय विधिक प्रणाली में गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम को आतंकवाद के विरुद्ध सबसे सशक्त हथियार माना जाता है। किंतु, वर्तमान सांख्यिकीय आंकड़े एक कड़वे सच की ओर इशारा करते हैं: इस कानून के तहत किसी व्यक्ति को सलाखों के पीछे भेजना जितना सरल है, उस पर लगे आरोपों को अदालत में सिद्ध करना उतना ही जटिल।

हिरासत और वास्तविक न्याय के बीच का यह फासला भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। जब हम सुरक्षा और स्वतंत्रता के संतुलन की बात करते हैं, तो यूएपीए के कार्यान्वयन में आई विसंगतियां इस संतुलन के बिगड़ने का स्पष्ट प्रमाण देती हैं। वर्ष 2019 से 2023 के बीच के आंकड़े इस कानून के प्रभाव और इसकी सीमाओं को उजागर करते हैं।

भारत भर में इस पांच साल की अवधि के दौरान कुल 5,690 लोगों को यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि इन गिरफ्तारियों में से केवल 5 प्रतिशत मामलों में ही दोष सिद्ध हो पाया और आरोपियों को सजा मिल सकी। यह निम्न कन्विकशन रेट (सजा दर) इस बात का प्रमाण है कि या तो जांच एजेंसियां साक्ष्य जुटाने में विफल रही हैं, या फिर कानून का उपयोग बिना ठोस आधार के किया गया है।

जम्मू-कश्मीर और पंजाब का विशेष संदर्भ सजा की कम दर का मुद्दा तब और भी भयावह हो जाता है जब हम विशिष्ट राज्यों के आंकड़ों को देखते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील इस केंद्र शासित प्रदेश में 2019-2023 के दौरान गिरफ्तार किए गए लोगों में से मात्र 0.62 प्रतिशत को ही सजा सुनाई गई। यह आंकड़ा दर्शाता है कि वहां एक बहुत बड़ी आबादी बिना किसी अपराध के सिद्ध हुए वर्षों तक हिरासत में रही।

पंजाब की स्थिति और भी विचलित करने वाली है। पंजाब में 2019 में जहां 30 गिरफ्तारियां हुई थीं, वहीं 2023 तक यह संख्या बढ़कर 50 हो गई। लेकिन आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस पूरी अवधि में एक भी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं किया जा सका। यह भारी असमानता हमारी न्याय प्रणाली के भीतर एक गहरे संस्थागत दोष को उजागर करती है।

संदिग्धों को आतंकवाद विरोधी कठोर प्रावधानों के तहत हिरासत में ले लिया जाता है, जिससे उन्हें जमानत मिलना लगभग असंभव हो जाता है, और वे वर्षों तक कानूनी अधर में लटके रहते हैं। यूएपीए के तहत धारा 43डी (5) जैसे प्रावधान जमानत को बेहद मुश्किल बना देते हैं। सामान्य आपराधिक कानूनों में जमानत एक नियम है और जेल अपवाद, किंतु यूएपीए में यह सिद्धांत उलट जाता है।

साल 2023 के आंकड़ों के अनुसार, आधे से अधिक मामले तीन साल से अधिक समय से लंबित पड़े थे। अक्सर आरोपी बिना मुकदमे के ही अपनी सजा से अधिक समय जेल में काट देते हैं। मुकदमे से पहले लंबे समय तक जेल में रहने वाले प्रमुख नामों में उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे व्यक्तित्व शामिल हैं, जिन्हें 2020 के दिल्ली दंगा मामले में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया था।

ये मामले यह समझने के लिए पर्याप्त हैं कि किस तरह बिना दोष सिद्ध हुए भी व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष खो देता है। यूएपीए कानून के भीतर आतंकवाद और आतंकी कृत्य की परिभाषा इतनी व्यापक और विस्तृत दी गई है कि इसने जांच एजेंसियों को असीमित शक्तियां प्रदान कर दी हैं।

इसी का दुष्परिणाम है कि अब इस कानून का इस्तेमाल केवल वास्तविक आतंकियों के खिलाफ न होकर, राजनीतिक असंतुष्टों, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ भी होने लगा है। एजेंसियां अक्सर सरकार की आलोचना या सामाजिक सक्रियता को राष्ट्रविरोधी गतिविधि मानकर यूएपीए की धाराओं में शामिल कर देती हैं।

इससे एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक वैध विरोध प्रदर्शन और वास्तविक आतंकी कृत्यों के बीच की विभाजक रेखा धुंधली हो गई है। जब असहमति की आवाज को दबाने के लिए आतंक-विरोधी कानूनों का उपयोग किया जाता है, तो यह कानून सुरक्षा का कवच न रहकर दमन का साधन बन जाता है। यूएपीए के दुरुपयोग को रोकने के लिए अब समय आ गया है कि सख्त कदम उठाए जाएं।

इसके लिए निम्नलिखित सुधार अनिवार्य हैं। यदि कोई जांच एजेंसी बिना किसी साक्ष्य के किसी व्यक्ति पर यूएपीए लगाती है और वह निर्दोष पाया जाता है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। जब तक इस दिशा में ठोस सुधार नहीं किए जाते, तब तक गलत हिरासत और न्याय के गर्भपात का साया भारतीय कानूनी प्रणाली पर मंडराता रहेगा। एक जीवंत लोकतंत्र वही है जहां कानून का भय अपराधियों में हो, न कि अपनी बात रखने वाले आम नागरिकों में।