उत्तर प्रदेश की राजनीति में सत्ता और धर्म दो ऐसे ध्रुव हैं जो अक्सर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। 2017 में हुए सत्ता परिवर्तन के आकस्मिक घटनाक्रम से लेकर वर्तमान में प्रयागराज की धरती पर शंकराचार्य पद को लेकर जारी विवाद तक, राज्य ने कई वैचारिक और प्रशासनिक मोड़ देखे हैं।
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 300 से अधिक सीटें जीतकर अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की थी। जीत के बाद मुख्यमंत्री के नाम को लेकर दिल्ली से लखनऊ तक भारी गहमागहमी थी। उस समय गाजीपुर के सांसद और तत्कालीन रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा को शीर्ष नेतृत्व की पहली पसंद माना जा रहा था।
उनके प्रशासनिक अनुभव और विकासोन्मुख छवि के कारण मीडिया ने लगभग उनकी ताजपोशी की घोषणा कर दी थी। कहा जाता है कि मनोज सिन्हा वाराणसी के मंदिरों में दर्शन भी कर चुके थे, लेकिन शपथ ग्रहण से ठीक 24 घंटे पहले घटनाक्रम ने यू-टर्न लिया। आरएसएस और भाजपा के आंतरिक सर्वे में यह बात सामने आई कि राज्य को एक ऐसे चेहरे की जरूरत है जो न केवल प्रशासन पर पकड़ रखे, बल्कि हिंदुत्व के एजेंडे को भी मजबूती से आगे बढ़ा सके।
ऐसे में योगी आदित्यनाथ का नाम सामने आया। गोरखपुर के फायरब्रैंड सांसद को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने एक स्पष्ट संदेश दिया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति अब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पथ पर चलेगी। शायद इसी वजह से योगी आदित्यनाथ को लगा कि उनकी बुलडोजर राजनीति धार्मिक संतों पर भी चल जाएगी।
जिस बात से वह नरेंद्र मोदी को डरा चुके थे, वही दांव शंकराचार्य पर आजमाना भारी पड़ गया। सत्ता के इस ऐतिहासिक बदलाव के वर्षों बाद, आज उत्तर प्रदेश का प्रयागराज (इलाहाबाद) एक अलग तरह के द्वंद्व का गवाह बन रहा है। यहाँ विवाद धर्मसत्ता के भीतर के पदानुक्रम और प्रशासनिक हस्तक्षेप को लेकर है।
मुख्य विवाद ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य की पदवी और उनके अधिकारों को लेकर है। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के बाद, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के उत्तराधिकार को लेकर कानूनी और धार्मिक चुनौतियां पेश आईं। वर्तमान विवाद तब गहराया जब प्रयागराज में माघ मेले या कुंभ की तैयारियों के दौरान प्रशासन द्वारा शंकराचार्य के शिविर, भूमि आवंटन और सुरक्षा प्रोटोकॉल को लेकर कड़ा रुख अपनाया गया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का तर्क है कि शंकराचार्य का पद सर्वोच्च है और प्रशासन को धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। दूसरी ओर, प्रशासन और कुछ विरोधी गुटों का कहना है कि जब तक उत्तराधिकार का मामला पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता, तब तक विशिष्ट प्रोटोकॉल लागू करने में कानूनी पेचदगियां बनी रहेंगी।
यह विवाद तब और बढ़ गया जब हाल ही में शंकराचार्य को उनके शिविर के पास बैरिकेडिंग और अन्य व्यवस्थाओं के विरोध में धरने पर बैठना पड़ा। यह स्थिति धर्मगुरुओं और राज्य सरकार के बीच एक वैचारिक टकराव को भी दर्शाती है, जो कि योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में विरल मानी जाती है।
इसी बात पर वर्ष 1983 में बनी सुपरहिट फिल्म आखिर क्यों का यह गीत याद आ रहा है। इस गीत को इंदीवर ने लिखा था और राजेश रोशन ने इसे संगीत में पिरोया था। इस गीत में अमित कुमार और लता मंगेशकर ने अपना स्वर दिया है। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।
तूफ़ां में हमें छोड़ के साहिल पे आ गए
साहिल पे आ गए
हम खेलने के वास्ते तक़दीर पा गए
तक़दीर पा गए
किस्मत ने हमें दर्द का पैगाम दिया है
उम्र भर का ग़म हमें इनाम दिया है
बीते हुए लम्हों की कसक साथ रहेगी
कसक साथ रहेगी
दुनिया ये मेरे प्यार की सुनसान रहेगी
सुनसान रहेगी
अश्कों ने हमें ज़हर का ये जाम दिया है
उम्र भर का ग़म हमें इनाम दिया है
तन्हाई में अब याद का मंजर न आएगा
मंजर न आएगा
प्यासा जो कोई होगा तो दर पर न आएगा
दर पर न आएगा
अपनों ने हमें बेमौत का अंजाम दिया है
उम्र भर का ग़म हमें इनाम दिया है
दुश्मन ना करे दोस्त ने वो काम किया है
उम्र भर का ग़म हमें इनाम दिया है…
उत्तर प्रदेश का इतिहास गवाह है कि यहाँ सत्ता का मार्ग अक्सर धर्म के गलियारों से होकर गुजरता है। जहाँ 2017 में मनोज सिन्हा के स्थान पर योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी ने राजनीति का भगवाकरण और केंद्रीकरण किया, वहीं प्रयागराज में शंकराचार्य विवाद यह याद दिलाता है कि धर्मसत्ता के भीतर की जटिलताएँ और परंपराएँ कभी-कभी राजनीतिक सत्ता के लिए भी चुनौती बन जाती हैं। अब मौते देखकर अपना मोटा भाई इसी विवाद के जरिए अपने सबसे कठोर दुश्मन यानी योगी आदित्यनाथ को ही निपटा देना चाहता है ताकि यूपी में भी उनकी पैठ हो सके। केशव प्रसाद मौर्य यूंही योगी की सोच के खिलाफ नहीं बोल रहे हैं, इस बात को समझ लेना होगा।