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स्थानीय निकाय चुनाव में अंततः गठबंधन टूट ही गया

अब भाजपा अकेले लड़ेगी चुनाव

राष्ट्रीय खबर

मुंबईः महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र की राजनीति में उस समय एक बड़ा मोड़ आ गया जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आगामी लातूर नगर निगम चुनावों के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजीत पवार गुट) के साथ गठबंधन को समाप्त करने की घोषणा की। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले ने मंगलवार देर रात स्पष्ट किया कि पार्टी अब लातूर की सभी 70 सीटों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेगी। यह निर्णय कई हफ्तों तक चली सीट-बंटवारे की उन वार्ताओं के विफल होने के बाद लिया गया, जिनमें दोनों दल किसी सर्वसम्मत फार्मूले पर नहीं पहुँच सके थे।

बावनकुले ने एनसीपी के नेतृत्व पर निशाना साधते हुए कहा कि अजीत पवार गुट द्वारा बातचीत के दौरान ऐसी मांगें रखी गईं जो भाजपा के लिए अस्वीकार्य थीं। भाजपा नेताओं का मानना है कि चूंकि पार्टी 2017 से लातूर नगर निगम की सत्ता में है और पिछले चुनाव में उसने 36 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया था, इसलिए वह अपनी स्थिति से समझौता नहीं कर सकती। बावनकुले ने मुंबई में पत्रकारों से कहा कि पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता और स्थानीय नेता विकास और सुशासन के अपने एजेंडे पर अकेले चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार हैं और उन्हें विश्वास है कि जनता भाजपा को पूर्ण बहुमत देगी।

इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए एनसीपी प्रवक्ता महेश लांडगे ने भाजपा के रुख को अहंकारी और अदूरदर्शी करार दिया। लांडगे ने कहा कि गठबंधन आपसी सम्मान और समझ से चलते हैं, लेकिन भाजपा ने एकतरफा फैसला लेकर राजनीतिक नैतिकता का उल्लंघन किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि भाजपा का यह अति-आत्मविश्वास विपक्षी गठबंधन ‘महा विकास अघाड़ी के लिए रास्ते खोल देगा, जो इस बहुकोणीय मुकाबले का लाभ उठा सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि मराठवाड़ा जैसे क्षेत्र में, जहाँ स्थानीय समीकरण और जातीय वफादारी बहुत मायने रखती है, गठबंधन टूटने से सत्ताधारी खेमे के वोटों का बिखराव होना तय है।

लातूर नगर निगम के लिए चुनावी प्रक्रिया 2 जनवरी से नामांकन के साथ शुरू होगी। मतदान 15 जनवरी, 2026 को निर्धारित है और परिणामों की घोषणा 16 जनवरी को की जाएगी। यह चुनाव न केवल लातूर की स्थानीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भविष्य में होने वाले बड़े चुनावों के लिए महाराष्ट्र में राजनीतिक समीकरणों की दिशा भी तय करेगा। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भाजपा अकेले दम पर अपना किला बचा पाएगी या विपक्ष इस विभाजन का लाभ उठाने में सफल होगा।