रांची: क्रिसमस पर्व के आते ही बाजारों में रौनक बढ़ जाती है. इसी रौनक का सबसे प्रमुख आकर्षण होती है चरनी. यीशु मसीह के जन्म स्थल को दर्शाने वाली यह छोटी-सी झांकी न सिर्फ ईसाई समुदाय की आस्था का केंद्र है, बल्कि प्रेम, त्याग, करुणा और सादगी का सार्वभौमिक संदेश भी देती है. चरनी में बालक यीशु, माता मरियम और यूसुफ की प्रतिमाओं के साथ चरवाहे, देवदूत और पशु-पक्षियों की आकृतियां शामिल होती हैं, जो प्रभु यीशु के विनम्र जन्म की कहानी को जीवंत करती हैं.
चरनी की क्या है खासियत
आज के समय में चरनी सिर्फ एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द्र और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक बन चुकी है. खास बात यह है कि अब चरनी का निर्माण और बिक्री केवल ईसाई समुदाय तक सीमित नहीं रहा. अन्य समुदायों के कारीगर और दुकानदार भी पूरे मनोयोग से चरनी बना रहे हैं और बाजारों में बेच रहे हैं. उनके लिए यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि एक संदेश है प्रेम और भाईचारे का.
चरनी विक्रेता बताते हैं कि प्रभु यीशु का जन्म एक साधारण गोशाला में हुआ था, जो यह सिखाता है कि ईश्वर सादगी में वास करते हैं. यही कारण है कि वे चरनी बनाते समय उसकी मूल भावना को बनाए रखने का प्रयास करते हैं. कई विक्रेता कहते हैं कि वे भले ही किसी और धर्म से हों, लेकिन यीशु मसीह के जीवन से प्रेरणा लेते हैं. विशेषकर मानवता, सेवा और त्याग के आदर्शों से.
कई तरह की चरनी बाजार में उपलब्ध
क्रिसमस बाजारों में इन दिनों एक से बढ़कर एक आकर्षक चरनी देखने को मिल रही है. मिट्टी, लकड़ी, पुआल और थर्मोकोल से बनी चरनियां बाजार में उपलब्ध हैं. इनकी कीमत 250 से शुरू होकर 2500 रुपए तक जाती है. लोग ऊंचे दामों पर भी इन्हें खरीदने से पीछे नहीं हट रहे, क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ सजावट का सामान नहीं, बल्कि आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है. घरों, चर्च और सार्वजनिक स्थलों पर चरनी सजाकर लोग प्रभु यीशु के आगमन की तैयारी कर रहे हैं.इस पर्व को लेकर अन्य समुदाय के चरनी विक्रेता भी यही संदेश दे रहे हैं कि क्रिसमस केवल एक धर्म का त्योहार नहीं, बल्कि मानवता का उत्सव है. वे कहते हैं कि जब लोग चरनी खरीदते हैं तो वे सिर्फ एक मूर्ति नहीं ले जाते, बल्कि प्रेम, शांति और आपसी भाईचारे का संदेश अपने घर ले जाते हैं. यही कारण है कि आज चरनी धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर सामाजिक एकता की मजबूत कड़ी बन चुकी है.