दो विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों ने यह कमाल कर दिखाया है
टोक्योः दिसंबर 2025 में अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया ने एक ऐसी उपलब्धि देखी है जो विज्ञान कथाओं जैसी लगती है। जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी और सुमितोमो फॉरेस्टरी के वैज्ञानिकों ने मिलकर दुनिया का पहला लकड़ी से बना उपग्रह लिग्नोसेट सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित कर दिया है। यह मिशन न केवल इंजीनियरिंग का एक उत्कृष्ट नमूना है, बल्कि अंतरिक्ष अन्वेषण को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम भी है।
पहली नज़र में लकड़ी को अंतरिक्ष जैसे कठोर वातावरण के लिए अनुपयुक्त माना जा सकता है, जहाँ तापमान में भारी उतार-चढ़ाव और विकिरण का प्रभाव होता है। लेकिन जापानी शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला परीक्षणों में पाया कि अंतरिक्ष के निर्वात में ऑक्सीजन की अनुपस्थिति के कारण लकड़ी न तो सड़ती है, न ही जलती है और न ही इसमें सिकुड़न आती है। इसके लिए मैगनोलिया की लकड़ी का उपयोग किया गया है, जो अपनी मजबूती और लचीलेपन के लिए जानी जाती है।
वर्तमान में अंतरिक्ष में हज़ारों मृत उपग्रह और मलबे के टुकड़े पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे हैं, जिन्हें स्पेस जंक कहा जाता है। जब एल्यूमीनियम और अन्य धातुओं से बने पारंपरिक उपग्रह अपना जीवनकाल समाप्त कर पृथ्वी के वायुमंडल में पुनः प्रवेश करते हैं, तो वे जलते समय एल्यूमिना के सूक्ष्म कण छोड़ते हैं। ये कण वर्षों तक ऊपरी वायुमंडल में रहकर सूर्य की रोशनी को परावर्तित करते हैं और ओजोन परत को गंभीर नुकसान पहुँचाते हैं। इसके विपरीत, लिग्नोसेट जैसा लकड़ी का उपग्रह वायुमंडल में प्रवेश करते ही पूरी तरह जलकर राख हो जाएगा, जिससे कोई भी विषाक्त अवशेष पीछे नहीं बचेगा।
इस प्रयोग की सफलता केवल उपग्रहों तक सीमित नहीं है। जापानी वैज्ञानिक इस तकनीक का उपयोग भविष्य में चंद्रमा और मंगल पर मानवीय बस्तियां बनाने के लिए करने की योजना बना रहे हैं। लकड़ी एक नवीकरणीय संसाधन है जिसे भविष्य में अंतरिक्ष में ही उगाया जा सकता है, जिससे पृथ्वी से भारी निर्माण सामग्री ले जाने की लागत कम होगी। यह मिशन तकनीकी विकास और पर्यावरणीय स्थिरता का एक अनूठा संगम है, जिसने नासा और ईएसए जैसी बड़ी एजेंसियों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।