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श्रीलंका में चक्रवात डिटवा का कहर और कर्ज माफी की दलील

दुनिया के 120 प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने आईएमएफ और विश्व बैंक से की अपील

कोलंबोः दिसंबर 2025 में श्रीलंका एक ऐसे मानवीय और आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है, जिसने आधुनिक इतिहास के सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। भीषण समुद्री तूफान चक्रवात डिटवा ने देश के दक्षिणी और मध्य प्रांतों में ऐसी तबाही मचाई है, जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। लगभग 220 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चली हवाओं और मूसलाधार बारिश ने पूरे द्वीप देश की संचार और बिजली व्यवस्था को पंगु बना दिया है।

आधिकारिक सरकारी आंकड़ों और संयुक्त राष्ट्र की राहत एजेंसियों के अनुसार, इस आपदा में अब तक 600 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं। चक्रवात के कारण आए भूस्खलन और बाढ़ ने लगभग 5 लाख लोगों को उनके घरों से बेदखल कर दिया है। हज़ारों घर मलबे में तब्दील हो चुके हैं और सुरक्षित पेयजल की कमी के कारण जलजनित बीमारियों का खतरा मंडराने लगा है। अस्पतालों में घायलों की संख्या क्षमता से अधिक हो गई है, जिससे चिकित्सा सुविधाओं पर भारी दबाव है।

श्रीलंका पहले से ही गहरे आर्थिक संकट और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी से जूझ रहा था। इस आपदा ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी है। इस स्थिति को देखते हुए, नोबेल पुरस्कार विजेता जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ सहित दुनिया के 120 प्रख्यात अर्थशास्त्रियों ने एक संयुक्त पत्र लिखकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से हस्तक्षेप की मांग की है।

इन विशेषज्ञों का तर्क है कि श्रीलंका को वर्तमान में पुनर्निर्माण के लिए कम से कम 10 अरब डॉलर की तत्काल आवश्यकता है। यदि उसके विदेशी कर्ज को माफ नहीं किया गया या भुगतान की अवधि को आगे नहीं बढ़ाया गया, तो देश पूरी तरह दिवालिया हो जाएगा, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ेगी।

यह संकट जलवायु न्याय के सवाल को फिर से अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले आया है। श्रीलंका जैसे देश ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, लेकिन वे इसके सबसे घातक परिणामों को झेल रहे हैं। भारत ने अपनी नेबरहुड फर्स्ट नीति के तहत नौसेना के जहाजों और वायु सेना के माध्यम से दवाएं, भोजन और राहत सामग्री भेजना शुरू कर दिया है। हालांकि, बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान की भरपाई में एक दशक से अधिक का समय लग सकता है। अब पूरी दुनिया की नज़रें अंतरराष्ट्रीय ऋणदाताओं पर हैं कि क्या वे मानवीय आधार पर श्रीलंका को यह आवश्यक जीवनदान देते हैं या नहीं।