वंदे मातरम की चर्चा से एक रोटी भी नहीं बनी
बचपन में हमने सुना था कि गधे पानी गंदा करके पीना पसंद करते हैं, लेकिन बड़े होकर समझ आया कि सिर्फ गधे ही नहीं, बल्कि सत्ता के चतुर खिलाड़ी और कुटिल मानसिकता वाले लोग भी पानी गंदा (विवाद पैदा) करके ही अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं। भारत की जनता एक सीधे-साधे और लुभावने नारे पर सहमत हुई थी अच्छे दिन आएंगे।
दशकों के कांग्रेस शासन के भ्रष्टाचार और वंशवाद से त्रस्त होकर लोगों ने एक चतुर प्रधानमंत्री के आह्वान पर भरोसा किया। उन्हें लगा था कि भाजपा के शासन में एक नया भारत दिखेगा। लेकिन सत्ता में आने के बाद से ही केवल विवादों का पानी गंदा किया जा रहा है। राम मंदिर, गोमांस, गीता पाठ, घर में घुसकर मारेंगे, विश्वगुरु, मदर ऑफ डेमोक्रेसी और 4 ट्रिलियन इकोनॉमी जैसे जुमलों के बीच देश फंस कर रह गया है।
इसी के बीच अचानक वन्दे मातरम् का विवाद खड़ा कर दिया गया। समस्या यह है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को शायद पढ़ा ही नहीं है। बंकिम बाबू ने केवल आनंदमठ नहीं लिखा था, बल्कि उनके उत्तरार्ध का लेखन समाज और धर्म पर अत्यंत गंभीर प्रहार करता है। प्रधानमंत्री को दुनिया में कोई महान विद्वान या बहुत पढ़ने वाला व्यक्ति नहीं मानता।
अगर उन्होंने आनंदमठ पढ़ा होता, तो वे वन्दे मातरम् को लेकर अनावश्यक विवाद पैदा नहीं करते। असल विवाद यह है कि वन्दे मातरम् की अंतिम पंक्तियों को क्यों नहीं गाया जाता? 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति, जिसमें महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस शामिल थे, ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया था कि इस गीत के केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे।
यह निर्णय रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर लिया गया था। टैगोर ने स्पष्ट कहा था कि केवल पहले दो छंद ही गायन के योग्य हैं। इसलिए आज अगर कोई इन पंक्तियों को छोड़ने पर सवाल उठाता है, तो वह सीधे तौर पर रवींद्रनाथ टैगोर की मेधा और चेतना को चुनौती दे रहा है। भाजपा का उद्देश्य स्पष्ट है—जनता को यह समझाना कि अर्थव्यवस्था और रोटी की चिंता से बड़ा धर्म है।
वे संदेश देना चाहते हैं कि हिंदू खतरे में हैं, मुसलमान तुष्टीकरण हो रहा है, और आपका मंगलसूत्र छीन लिया जाएगा। वे हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ एकजुट करना चाहते हैं। वरना कोई यह बता दें कि जनता का करोड़ों रुपया खर्च कर वंदेमातरम पर संसद में चर्चा से क्या देश के किसी गरीब को एक रोटी भी मिल पायी।
लेकिन आइए देखते हैं कि धर्म और खान-पान पर स्वयं बंकिम चंद्र के क्या विचार थे। बंकिम बाबू के अंधभक्तों को उनकी रचना कमलाकांत का दफ्तर पढ़ना चाहिए। मार्क्स ने कहा था, धर्म अफीम है। बंकिम बाबू ने भी 1875 में अपनी रचना बिल्ली में धर्म की तुलना अफीम से ही की थी। इस व्यंग्य में एक बिल्ली कमलाकांत से कहती है कि समाज में अमीरों का धन बढ़ना ही उन्नति नहीं है। बिल्ली कहती है कि अगर कोई अमीर पांच सौ गरीबों का हक मारकर संसाधन जमा करता है और बचे हुए टुकड़े भी गरीबों को नहीं देता, तो गरीब का चोरी करना जायज है क्योंकि कोई भी इस दुनिया में भूखा मरने के लिए नहीं आया है।
जब कमलाकांत उसे नैतिकता और धर्म का उपदेश देता है, तो बिल्ली कहती है कि चोर को सजा देने वाला न्यायाधीश पहले खुद तीन दिन उपवास करके देखे, फिर उसे पता चलेगा कि भूख क्या होती है। अंत में कमलाकांत बिल्ली को न्यूमैन और पार्कर की किताबें पढ़ने और धर्म में मन लगाने की सलाह देता है, जिस पर बिल्ली कटाक्ष करती है कि उसे अफीम (धर्म) की जरूरत नहीं है, वह अपनी भूख के हिसाब से तय करेगी कि उसे क्या खाना है।
इतना ही नहीं, आज जो शाकाहार बनाम मांसाहार का विवाद खड़ा किया गया है, उस पर भी बंकिम बाबू के विचार चौंकाने वाले हैं। उन्होंने लिखा था कि बंगालियों की शारीरिक कमजोरी का मुख्य कारण चावल है। उन्होंने तर्क दिया था कि मांस और गेहूं (ग्लूटेन) शरीर को बलवान बनाते हैं। बंकिम के अनुसार, अगर बंगालियों को शक्तिशाली बनना है, तो उन्हें मांस खाना चाहिए।
आज अगर बंकिम जीवित होते, तो वे शायद यही कहते— गीता पढ़ो, लेकिन साथ में शरीर की मजबूती के लिए मांस और पौष्टिक आहार भी लो। निष्कर्ष यह है कि बंकिम चंद्र को पचाना आसान नहीं है। सत्ता के नरेंद्र ने बंकिम का नाम तो लिया, लेकिन उनके विचारों को नहीं समझा। फलस्वरूप, उन्हें आज वैचारिक बदहजमी हो गई है। बंकिम चंद्र के विचार धर्म के मामले में काफी हद तक मार्क्सवादी चेतना के करीब थे, जो आज की हिंदुत्ववादी राजनीति के बिल्कुल विपरीत है।