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नक्सलबाड़ी में पत्थरों में होती है देवी की पूजा

प्रकृति ही देवी है की सोच पर आदिवासियों की दुर्गा पूजा

  • चट्टानें जिन्हें माना जाता है देवी का रूप

  • दंताओरंग और दंताबेरंग नामक दो पत्थर हैं

  • सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी को हम दूसरे कारण से अधिक जानते हैं। यह कारण दरअसल यहां से नक्सल आंदोलन का उदय है। जिसके बाद चारू मजूमदार, जंगल संथाल और कानू सामंत जैसे बड़े नक्सल नेता अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए थे। इस इलाके से पनपा नक्सल आंदोलन बाद में पूरे देश में फैल गया था।

लेकिन इसी नक्सलबाड़ी की एक दूसरी और प्राचीन पहचान भी है। यहां धीमल जनजाति एक अनूठी परंपरा का निर्वहन कर रही है, जो हमें प्रकृति और आध्यात्मिकता के गहरे संबंध की याद दिलाती है। यह जनजाति, जो भारत की सबसे प्राचीन जनजातियों में से एक है, पिछले 250 वर्षों से किसी मंदिर में स्थापित देवी दुर्गा की मूर्ति की पूजा नहीं करती, बल्कि दो चट्टानों को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा करती है। यह पूजा प्रकृति के प्रति उनके गहरे सम्मान और विश्वास को दर्शाती है।

धूमिल जनजाति के लोग दंताओरंग और दंताबेरंग नामक इन दो चट्टानों को देवी दुर्गा के छठी और दसवीं रूप के समान पूजते हैं। ये दोनों चट्टानें सौ वर्षों से भी अधिक समय से एक साथ रखी हुई हैं, जो उनकी अटूट आस्था का प्रतीक हैं। धीमल जनजाति के मुखिया, गोरजेनकुमार मल्लिक, बताते हैं कि वे सदियों से प्रकृति को ही अपनी माता मानते आ रहे हैं। उनकी दुर्गा पूजा किसी भव्य आयोजन की तरह नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ एक आत्मीय संवाद की तरह होती है।

धीमल जनजाति की दुर्गा पूजा चार दिनों तक चलती है, जिसमें उनका अपना संगीत और नृत्य शामिल होता है। वे चोंगा मिरदांग, पासिंगकोदोतारा, पासिंगकोधोल, तुंजाई, गुमरा, मुचुंगा और तुम्ना जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाते हैं। इस दौरान, लड़कियाँ पारंपरिक परिधान पहनकर गाती और नाचती हैं।

इन गीतों में साल भर के सुख-दुख, दैनिक जीवन की कठिनाइयां और प्रेम की भावनाएं व्यक्त होती हैं। ये लोग अपने गीतों को देवी को समर्पित करते हैं, यह मानते हुए कि देवी इन भावनाओं का ध्यान रखेंगी। ग्रामीण प्रतिमा सिंह मलिक ने बताया कि यह उनकी सदियों पुरानी परंपरा है, और उन्हें अपनी पूजा के लिए किसी ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं होती, वे स्वयं ही प्रकृति माँ की पूजा करते हैं।

गोरजेनकुमार मल्लिक ने बताया कि उनकी जनजाति लगभग 200 से 300 साल पहले असम से घने जंगलों के रास्ते होते हुए भारत-नेपाल सीमा के नक्सलबाड़ी क्षेत्र में आई थी। उनकी जनजाति के कई लोग आज भी नेपाल में रहते हैं। पिछले 20 सालों में, इस गाँव के अन्य समुदायों, विशेष रूप से राजबंशी समुदाय के अनुरोध पर, दंताओरंग और दंताबेरंग के पास देवी दुर्गा की मूर्ति भी स्थापित की जाने लगी है।

गोरजेन कहते हैं, हमारी पूजा बिना किसी दिखावे के होती थी, लेकिन अब हमारी शिलाओं के साथ-साथ मूर्तियों की भी पूजा होने लगी है। ग्रामीण मनीषा मलिक के अनुसार, चाहे वे चट्टानों की पूजा करें या मूर्तियों की, उनकी श्रद्धा पूरी तरह से समर्पित होती है।

यह अनूठी परंपरा न केवल धीमल जनजाति की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है, बल्कि यह भी संदेश देती है कि प्रकृति को पूजने के लिए किसी भव्य संरचना की आवश्यकता नहीं होती। उनका मानना है कि सच्ची आस्था बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता से आती है।