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आधी आबादी ने अपनी राजनीतिक ताकत का एहसास कराया

महाराष्ट्र में कमल तो झारखंड में तीर धनुष

  • महायुती के सामने एमवीए पूरी तरह पस्त

  • हेमंत की आंधी में उड़ गयी भाजपा सेना

  • महिलाओं की सोच का निष्कर्ष निकला

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः दो राज्यों के चुनाव परिणामों में समानता देखा जाए तो साफ हो जाता है कि महिलाओं का समर्थन ही किसी एक गठबंधन की जीत का कारण बना है। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की सरकार ने लाडली योजना को लागू किया था तो झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार ने मईया योजना से आधी आबादी को अपने पाले में कर लिया। तमाम अन्य विषयों पर शायद अधिसंख्य मतदाताओं ने ध्यान ही नहीं दिया।

मध्यप्रदेश में भाजपा की जीत के बाद खुद शिवराज सिंह चौहान ने लाडली बहना योजना को इसका श्रेय दिया था। इसके बाद महाराष्ट्र की महायुति सरकार उसी रास्ते पर चली। डिप्टी सीएम और वित्त मंत्री अजित पवार ने अंतरिम बजट पेश करते हुए मुख्यमंत्री माझी लड़की बहन योजना की घोषणा की। इस योजना के तहत उस राज्य की 21 से 60 वर्ष की महिलाओं को प्रति माह 1500 रुपये का सरकारी भत्ता मिलेगा।

इससे पहले हम पश्चिम बंगाल में भी तृणमूल कांग्रेस की जीत में महिलाओं की भागीदारी की ताकत को देख चुके हैं। महाराष्ट्र में भी बंगाल और मध्य प्रदेश की तरह, पैसा संबंधित महिलाओं के बैंक खातों में जमा किया जाएगा। यह योजना जुलाई से प्रभावी हुए। चार महीने पहले महिलाओं के लिए इस योजना को ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों ने महिला वोटों को आकर्षित करने की रणनीति माना था।

हालाँकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इस योजना का पैसा उस आयु वर्ग की सभी महिलाओं को दिया जाएगा या उनकी वित्तीय स्थिति को देखते हुए दिया जाएगा। शिंदे सरकार ने अभी तक इस बारे में विस्तार से कुछ नहीं कहा है।

दूसरी तरफ झारखंड में भी हेमंत सोरेन ने मईंया योजना का कार्ड खेला था। इस योजना के तहत अनेक महिलाओं के बैंक खाता में पैसे आये भी थे। इस चुनौती को समझते हुए भाजपा ने भी गोगो दीदी योजना का एलान किया था पर वह महिलाओं का दिल जीतने में शायद कामयाब नहीं हो पायी।

इन दोनों ही राज्यों के चुनाव परिणाम से यह संकेत भी साफ हो जाता है कि अब मतदाताओं ने भी अपने फैसले की तकनीक बदल दी है और वे भावी आश्वासनों के बदले जो कुछ ठोस मिल रहा है, उसे ही प्राथमिकता दे रहे हैं।

चुनाव आयोग ने हाल ही में बताया कि एक महीने पहले समाप्त हुए लोकसभा चुनाव में 31.2 मिलियन महिलाओं ने मतदान किया। जो प्रतिशत के हिसाब से 65.78 है। पुरुष मतदान दर 65.8 है। तो यह आँकड़ा महिलाओं के वोट के महत्व को दर्शाता है। आयोग के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर एक और बात स्पष्ट हो जाती है। महाराष्ट्र एक अपवाद है जहां देशभर में महिलाओं की वोटिंग दर बढ़ी है।

हाल ही में संपन्न हुए आम चुनाव में उस राज्य में महिलाओं की वोटिंग दर 59 फीसदी थी, जबकि पुरुषों की वोटिंग दर 63 फीसदी थी। सांख्यिकीय विश्लेषण से पता चलता है कि जहां देश के अधिकांश राज्यों में पुरुषों और महिलाओं की मतदान दर लगभग बराबर है, वहीं जिस राज्य में देश की वाणिज्यिक राजधानी स्थित है वह पुरुषों की तुलना में 4 प्रतिशत कम है।

राजनीतिक वैज्ञानिकों के एक वर्ग का मानना ​​है कि महिलाओं का राजनीति और राजनेताओं से मोहभंग हो गया है, साथ ही बढ़ती महंगाई, आत्मनिर्भरता की कमी आदि भी।

इसके अलावा, उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (ईडब्ल्यूएस) और ओबीसी समुदाय की लड़कियों के लिए सभी फीस माफ कर दी गई है। इसके तहत 2 लाख से ज्यादा लड़कियां आएंगी। इसके अलावा चालू वित्त वर्ष में 25 लाख महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाने का लक्ष्य रखा गया है। लड़कियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनें इसके लिए सरकार 10 हजार महिलाओं को ई-रिक्शा मुहैया कराएगी।

इस प्रोजेक्ट को लेकर शिवसेना (उद्धव) प्रमुख और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा, आपने महिलाओं के लिए अच्छा काम किया है। लेकिन राज्य के नौनिहालों के पास कोई आय नहीं है, क्योंकि सरकार नौकरी नहीं दे सकी। यदि हां, तो उन्हें उनके लिए भी एक भत्ता पेश करने दें। यदि नहीं, तो इस कदम को भेदभावपूर्ण व्यवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए।

कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) ने भी इस जुमलेबाजी की कड़ी आलोचना की थी। अब दोनों ही सत्तारूढ़ समूहों को अपने शेष चुनावी वादों को पूरा करने की दिशा में भी ठोस कदम उठाने होंगे। राजनीतिक बहस के बावजूद, अर्थशास्त्रियों से लेकर समाजशास्त्रियों तक, राजनीतिक वैज्ञानिकों का एक वर्ग दृढ़ता से मानता है कि सभी राजनीतिक दल मतपेटी में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को मतदाताओं के प्रभावित होने का एक प्रमुख कारण मान रहे हैं।