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सूचना तकनीक पर भी कब्जे की सरकारी कोशिश

केंद्र सरकार अब सोशल मीडिया में अपने खिलाफ प्रसारित होने वाली सूचनाओं से परेशान है। पहले इस सरकार ने मुख्य धारा की मीडिया को अपने अनधिकृत कब्जा में लेने के बाद सोशल मीडिया पर अपने माध्यमों से अपना प्रचार किया था। अब दूसरे दलों को भी इस सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना आ गया है।

इस वजह से अब जो रास्ता भाजपा के आईटी सेल ने अपनाया था, वही रास्ता उनके लिए परेशानी का सबब बन रहा है। दूसरी तरफ अफवाहों के असर को भी बार बार सोशल मीडिया में देखा जा सकता है। अभी झारखंड के पांकी में एक सांप्रदायिक तनाव के बाद ऐसी स्थिति रही है उस इलाके में लगातार तीन दिनों तक इंटरनेट बंद रखा गया।

इसी वजह से अब पाया जा रहा है कि यह भारत का लगातार पांचवा वर्ष है, जिसमें वह पूरी दुनिया में इंटरनेट बंद करने वाले देशों में शीर्ष पर बना हुआ है। इस पर सर्वेक्षण करने वाली एक कंपनी ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2022 में भारत में आधिकारिक तौर पर 84 बार इंटरनेट बंद किया गया।

सन 2016 से अब तक दुनियाभर में इंटरनेट पर बंदी लगाने की जितनी घटनाओं का दस्तावेजीकरण हुआ उनमें से 58 फीसदी भारत से जुड़ी हैं। इंटरनेट पर पूरी बंदी के अलावा 2015 से 2022 के बीच भारतीय अधिकारियों ने 55 हजार से अधिक वेबसाइट को ब्लॉक किया। अकेले 2022 में ऐसी 6,700 वेबसाइट और प्लेटफार्म को ब्लॉक किया गया।

इनमें से कई वेबसाइटों को बंद करना जायज भी था क्योंकि वे लोगों की धार्मिक भावना को भड़काने का काम कर रहे थे। दूसरी तरफ ऐसी कई वेबसाइटों को सरकारी संरक्षण मिलता रहा जो भाजपा की मदद के लिए ऐसी ही सूचनाओं को लगातार प्रसारित करते रहे। इस क्रम में तमिलनाडू में बिहारी मजदूरों की हत्या और मार पीट से संबंधित वीडियो का उदाहरण लिया जा सकता है।

जांच में यह सारी सूचनाएं फर्जी साबित हुई हैं। तमिलनाडू और बिहार में इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। तमिलनाडू पुलिस ने इस मामले में उत्तरप्रदेश के एक भाजपा नेता के खिलाफ भी मामला दर्ज किया है। खुद तमिलनाडू के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने आरोप लगाया है कि जब उन्होंने विपक्ष को एकजुट होने का आह्वान किया, उसके बाद ही भाजपा ने तमिलनाडू में इस किस्म का सामाजिक विद्वेष फैलाने की सूचनाओं को आगे बढ़ाने का काम किया।

हम जानते हैं कि इंटरनेट पर ऐसी पाबंदी और सेंसरशिप अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार का हनन करते हैं। इसके अलावा इनके आर्थिक दुष्प्रभाव भी हैं तथा यह डिजिटल इंडिया को प्रोत्साहित करने की घोषित सरकारी नीति के भी विरुद्ध है। इस नीति के तहत ही ई-कॉमर्स तथा डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा दिया जाता है।

हालांकि इसे लेकर कानूनी चुनौतियां भी मौजूद हैं लेकिन इसके बावजूद केंद्र और राज्य सरकारें एक झटके से ऐसी बंदी लगाती रहीं। नागरिकों के विरोध प्रदर्शन, राजनीतिक दृश्य संवेदनशील हत्याएं, चुनाव और यहां तक कि परीक्षाओं में चीटिंग रोकने को भी इसकी वजह बनाया गया। यद्यपि संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मसले पर संसद की स्थायी समिति ने सरकार से आग्रह किया लेकिन इसके बावजूद वह बंदी के आदेशों से संबंधित आंकड़े सामने रखने की इच्छुक नहीं है।

यानी वह इस मामले में पारदर्शिता के पक्ष में नहीं है। सरकार के पास ऐसी बंदी को लागू करने तथा हटाने की प्रक्रिया को लेकर भी कोई स्पष्ट सिद्धांत नहीं है। जम्मू कश्मीर दुनिया में सर्वाधिक इंटरनेट बंदी वाली जगह बना रहा और 2022 में वहां ऐसी 49 घटनाएं हुईं। तीन दिनों तक वहां कर्फ्यू की शैली में लगातार 16 आदेश जारी कर बंदी की गई।

इसके अलावा राजस्थान में 12 बार, पश्चिम बंगाल में सात बार और हरियाणा तथा झारखंड में ऐसी घटनाएं चार-चार बार हुई। शायद ऐसी अनेक घटनाएं दर्ज भी नहीं हुई होंगी। ऐसे ही एक अध्ययन के मुताबिक भारत को 2020 में इस प्रकार की इंटरनेट बंदी के कारण संभवत 2.8 अरब डॉलर मूल्य की आर्थिक क्षति पहुंची जबकि 2021 में 50 करोड़ डॉलर के नुकसान का अनुमान है।

हर बार बंदी लगने पर छोटे और बड़े दोनों तरह के कारोबारों को ऑनलाइन ऑर्डर का नुकसान उठाना पड़ा और इससे राजस्व की हानि हुई। ऐसी स्थितियों में पैसे को डिजिटल तरीके से कहीं भेजना या नेट बैंकिंग और फिनटेक सेवाओं का लाभ लेना मुश्किल हो जाता है। कश्मीर और पूर्वोत्तर जैसे जिन इलाकों में बार-बार बंदी की जाती है वहां नकदी का चलन बढ़ता है वे बाकी देशों की तुलना में पिछड़ जाते हैं।

दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को भी राजस्व की हानि होती है तथा उनके ग्राहकों में असंतोष बढ़ता है। कुल मिलाकर यह साफ हो रहा है कि अब सरकार और भाजपा की परेशानी यह है कि जिस हथियार का उसने अपने लाभ के लिए इस्तेमाल किया अब वही हथियार उसके खिलाफ आजमाया जा रहा है।