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झारखंड की राजनीति में कीचड़ होली का माहौल बना

  • राजीव अरुण एक्का का वीडियो जारी

  • निगरानी की जांच में फंसे हैं कई नेता

  • दलालों की चांदी हर सरकार में एक जैसी कटी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड में होली का माहौल यहां की राजनीति पर भी फिलहाल चढ़ा हुआ है। दरअसल भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने एक वीडियो जारी किया है। इसमें मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव राजीव अरुण एक्का एक निजी व्यक्ति के दफ्तर में बैठकर फाइल निपटाते बताये गये हैं। वीडियो सच है या फर्जी, इसकी पुष्टि अभी नहीं हो पायी है।

वैसे वीडियो के जारी होने के बाद राजीव अरुण एक्का को उनके पद से अन्यत्र भेज दिया गया है। वैसे भाजपा की तरफ से जो आरोप अभी लगाये जा रहे हैं, उसका उत्तर में झामुमो के पास भी पहले से निगरानी जांच के मुद्दे तैयार हैं। जाहिर है कि होली में दोनों तरफ से एक दूसरे पर कीचड़ फेंकने का सिलसिला चलेगा लेकिन यह लड़ाई बहुत अधिक दिनों की नहीं होगी।

दरअसल इडी की कार्रवाई में यह स्पष्ट कर दिया है कि झारखंड में सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, दलालों और अफसरों की अपनी गिरोहबंदी अलग चलती रहती है। कभी भाजपा के शासन काल में जो चेहरे चर्चित थे, वे भले ही अब पर्दे के पीछे चले गये हैं लेकिन उनके अपने ही लोग अब इस हेमंत सरकार में सक्रिय हैं। कुल मिलाकर घटनाक्रमों को पूर्व की स्थिति से मिलाकर देखें तो दलालों की चांदी पहले भी थी और अब भी वही है। सिर्फ चंद चेहरे बदल गये हैं।

जहां से इस विवाद की शुरुआत हुई थी, उसकी चर्चा करें तो यह मुद्दा हेमंत सोरेन की माइनिंग की लीज का था। अब दस्तावेज इस बात की गवाही देते हैं कि इसी किस्म की गड़बड़ियां पूर्व में भाजपा नेताओँ द्वारा भी की जाती रही है। इसलिए जब राज्य सरकार के निगरानी विभाग ने मामले की जांच की तो ऐसे कई साक्ष्य निकलकर सामने आये, जो भाजपा को परेशानी में डाल सकते थे।

राजनीति के धाकड़ खिलाड़ी हेमंत सोरेन ने इन तोप के गोलों को बाद में चलाने के लिए बचाकर रख छोड़ा है। वैसे इस बात की भी जानकारी है कि निगरानी जांच के सिलसिले में एक बड़े नेता को जब निगरानी के किसी अफसर का फोन गया था तो अफसर को धमकाने की कोशिश उस नेता को उल्टी पड़ गयी थी। चंद बातों का उल्लेख होने के बाद अफसर की बात सुनकर वह नेता ही बेहोश हो गया था। उसके बाद से निगरानी के अफसरों ने भी इस मामले को ज्यादा नहीं छेड़ा।

इसलिए तय माना जा रहा है कि ईडी जिस तरीके से वर्तमान सरकार को घेरना चाह रही है, उसी तरीके से निगरानी ने पहले से कई लोगों की घेराबंदी कर रखी है। यह अलग बात है कि पहले के एक चालाक अफसर मौका ताड़कर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली चले गये हैं। यह अफसरों के बचाव का एक सुगम मार्ग है।

अब राजीव अरुण एक्का के जरिए ईडी सबसे पहले किन अधिकारियों की गरदन नापना चाहती है, यह स्पष्ट हो गया है। लेकिन ईडी को भी यह पता है कि इन अफसरों के साथ साथ कभी भाजपा के करीबी समझे गये अफसर भी इसी जाल में फंस जाएंगे। दूसरी तरफ राज्य सरकार के पास पहले से ही निगरानी जांच का तोप मौजूद है। इसलिए होली के मौसम में कीचड़ फेंकने से ज्यादा अभी मामले की गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी।