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वायरस के जरिए इंफ्लूएंजा के ईलाज की तैयारी

  • एक नये यौगिक की पहचान की गयी है

  • यह नये शरीर में गैर खतरनाक होता है

  • चूहों पर हुए परीक्षण में विधि सफल रही

राष्ट्रीय खबर

रांचीः वायरस के बारे में दुनिया का आम आदमी इस कोरोना महामारी के दौरान ज्यादा जानकारी हासिल कर चुका है। इसलिए इसे एक नजर नहीं आने वाले जानलेवा दुश्मन के तौर पर भी पहचाना गया है। खतरे की बात यह भी है कि यह वायरस प्रकृति से तालमेल बैठाकर अपना स्वरुप बदलता भी रहता है।

दूसरी तरफ ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बर्फ से ढंके अनेक इलाकों से अब प्राचीन काल से दबे पड़े वायरस भी बाहर आ रहे हैं। दुनिया में किसी भी युद्ध में जैविक हथियार के तौर पर इस्तेमाल के लिए भी इसी वायरस की पहचान हुई है। अब इसी वायरस के जरिए ईलाज पर भी जेनेटिक वैज्ञानिक काम कर रहे हैं।

ऐसा तब हो रहा है जबकि दुनिया अब भी इस जानकारी से अनभिज्ञ है कि दरअसल कोरोना वायरस प्राकृतिक तौर पर ही इंसानों पर हमलावर हुआ अथवा यह चीन के वुहान स्थित प्रयोगशाला से बाहर निकला था।

बॉन विश्वविद्यालय में क्लस्टर ऑफ एक्सीलेंस इम्यूनोसेंसेशन 2 के शोधकर्ता, जापानी शोधकर्ताओं के साथ मिलकर इन्फ्लूएंजा के इलाज के लिए इसका फायदा उठाना चाहते हैं।

विश्वविद्यालय अस्पताल बॉन में कार्डियोवास्कुलर इम्यूनोलॉजी संस्थान के प्रोफेसर हिरोकी काटो के नेतृत्व वाली टीम ने एक यौगिक की पहचान की है जो शरीर के अपने मिथाइलट्रांसफेरेज़ एमटीआर 1 को रोकता है, जिससे इन्फ्लूएंजा वायरस की प्रतिकृति सीमित हो जाती है।

यह यौगिक फेफड़े के ऊतकों की तैयारी और चूहों पर हुए अध्ययन में प्रभावी साबित हुआ और पहले से स्वीकृत इन्फ्लूएंजा दवाओं के साथ सहक्रियात्मक प्रभाव दिखाया। इस शोध अध्ययन का लेख अब साइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

बताया गया है कि यह प्रतिकृति के लिए, वायरस को एक मेजबान सेल की आवश्यकता होती है। वहां वे न्यूक्लिक एसिड डीएनए या आरएनए के रूप में अपनी अनुवांशिक जानकारी पेश करते हैं। इन आणविक ब्लूप्रिंट का उपयोग मेजबान सेल में नए वायरस उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।

शरीर के अंदर बाहर से आये किसी ऐसे घुसपैठ को स्वयं के न्यूक्लिक एसिड से अलग करने के लिए, सेल एक प्रकार की लेबलिंग प्रणाली का उपयोग करता है। वरना शरीर की आंतरिक संरचना किसी ऐसे बाहरी आक्रमण की पहचान होते ही अपने आप ही प्रतिरोधक तैयार करने लगता है।

इसमें देखा गया है कि यह वायरस यौगिक खुद को इस तरीके से जोड़ता है कि दूसरे शरीर में किसी नये हमले के तौर पर दर्ज नहीं होता और इसे शरीर अपने लिए गैर-खतरनाक के रूप में पहचानता है। यह प्रतिरक्षा प्रणाली को विशेष रूप से खतरों पर प्रतिक्रिया करने में सक्षम बनाता है।

हालांकि, अगर कोशिका में आरएनए है जिसमें टोपी संरचना की कमी है, तो इसे प्रतिरक्षा रिसेप्टर आरआईजी-आई द्वारा पहचाना जाता है, और प्रतिरक्षा प्रणाली सतर्क हो जाती है। इससे बचने के लिए इन्फ्लूएंजा वायरस ने एक विशेष तंत्र विकसित किया है। वे सेलुलर आरएनए अणुओं से आणविक टोपी चुराते हैं और इसे अपने स्वयं के आरएनए में स्थानांतरित करते हैं।

इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक परिभाषा में कैप-स्नैचिंग कहा जाता है। यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल बॉन में इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोवास्कुलर इम्यूनोलॉजी के प्रोफेसर हिरोकी काटो के नेतृत्व वाली टीम अब यह दिखाने में सक्षम है कि इन्फ्लूएंजा वायरस एंजाइम एमटीआर1 के कार्य पर कितना निर्भर करते हैं।

पेपर के प्रमुख लेखक यूटा त्सुकामोटो कहते हैं, कि अन्य वायरस, जैसे कि सार्स कोव 2 अपने आरएनए अणुओं को अपने दम पर कैप करने में सक्षम होते हैं। इन्फ्लूएंजा वायरस मौजूदा कैप को चुराने पर भरोसा करते हैं। इसी विधि को अब ईलाज के काम में लाने पर शोध चल रहा है।