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कौन सा राज छिपाना चाहती है भाजपा

दिल्ली नगर निगम में महापौर का चुनाव एक बार फिर नहीं हो पाया। पार्षदों के हंगामे के दौरान यह साफ नजर आया कि भाजपा ने अपनी तरफ से हंगामा करने की पूरी तैयारी कर ली थी। भाजपा की इस चाल को आम आदमी पार्टी समझ रही थी फिर भी वह अपने लोगों को अंत तक नियंत्रित नहीं रख पायी।

दिल्ली नगर निगम में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत हुए चुनाव में आम आदमी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल चुका है। इसके बाद भी भाजपा की तरफ से सारा खेल उप राज्यपाल की ओट में खेला जा रहा है। मनोनित पार्षदों को सबसे पहले शपथ दिलाने को लेकर हंगामा हुआ लेकिन इस बार आप के सदस्य तैयारी से आये थे।

इसलिए उकसाये जाने के बाद भी चुपचाप बैठे रहे। याद दिला दें कि इससे पहले गत छह जनवरी को भी इसी मुद्दे पर दोनों दलों के पार्षदों के बीच हाथापायी तक हुई थी। चूंकि मामला गरमा था और वहां मीडिया भी मौजूद थे।

इसलिए यह साफ साफ नजर आया कि कौन क्या कर रहा था। सदन के अंदर मोदी मोदी के नारे के साथ भाजपा पार्षद लगातार अपनी संख्या कम होने की परेशानी पर झेंप रहे थे। उन्हें अच्छी तरह पता था कि चुनाव होने की स्थिति में उनके जीतने की कोई संभावना नहीं है जबकि कांग्रेस ने खुद को इससे पूरी तरह अलग रखा है।

इसलिए यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर दिल्ली नगर निगम के मेयर पद पर भाजपा अपना कब्जा क्यों चाहती है। इसका एक उत्तर आप द्वारा पूर्व महापौर और भाजपा नेता आदेश गुप्ता और श्याम जाजो की कंपनी के कारोबार को लेकर पहले ही आ चुका है।

इन दोनों नेताओँ के खिलाफ लोकायुक्त के पास पहुंची शिकायतों का हवाला देते हुए आम आदमी पार्टी ने जो मुद्दे उठाये हैं, वैसे कितने मुद्दे इस नगर निगम में दफन हैं, इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में है। लेकिन यह साफ है कि भाजपा पार्षदों पर जो आरोप लगे हैं, उनमें से अधिकांश वहां की जनता द्वारा लगाये गये हैं।

सामान्य स्कूटर में चलने वाले इतनी जल्दी अमीर कैसे हो गये, इस सवाल को न तो कोई पूछ रहा है और ना ही कोई उसका संतोषजनक उत्तर देने की स्थिति में है। यह स्पष्ट है कि कल के हंगामे में इसकी भूमिका पीठासीन अधिकारी से प्रारंभ हुई।

पीठासीन अधिकारी ने एजेंडा बदला , आप की आपत्ति के बाद भी शपथ पूरी सदन के एजेंडे में पहले नंबर पर काउंसलर और मनोनित पार्षदों की शपथ की बात लिखी थी , लेकिन पीठासीन अधिकारी ने पहले मनोनित पार्षदों को शपथ दिलाना प्रारंभ किया।

इससे साफ हो गया था कि भाजपा ने मेयर चुनाव को स्थगित करने का एजेंडा पहल से ही तय कर लिया था। आदेश गुप्ता और श्याम जाजू के मामले में आम आदमी पार्टी की तरफ से प्रेस कांफ्रेंस कर जो आरोप लगाये गये हैं, उनका संतोषजनक उत्तर अब तक भाजपा की तरफ से नहीं आया है।

इससे पहले भी दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर खुद अरविंद केजरीवाल कई बार दिल्ली नगर निगम में भाजपा पार्षदों के भ्रष्टाचार की शिकायत कई मंचों से कर चुके हैं। इसके अलावा नगर निगम द्वारा संचालित स्कूलों की दशा नहीं सुधरना भी आम जनता की नजरों में भाजपा कि विफलता की कहानी कहता है।

संदेह है कि इन तमाम कार्यों में जो सरकारी धन आवंटित किया गया है, वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। दिल्ली की शिक्षा और स्वास्थ्य के मॉडल की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो प्रशंसा हो रही है, वह भी भाजपा के लिए चिंता का विषय है क्योंकि इसी आधार पर पंजाब में भी इस पार्टी ने अपनी सरकार बना ली है और गुजरात में वह अब मजबूत स्थिति में है।

ऐसे में केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण दिल्ली सरकार के अधिकारियों को नियंत्रित करने की चाह भी गृह मंत्रालय के माध्यम से भाजपा की है। आखिर इस तरीके से भाजपा का परेशान होना तो यही संकेत देता है कि उन्हें नगर निगम में भी पुरानी फाइलों को खोले जाने से डर लग रहा है।

दिल्ली सरकार के अधीन भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी होने के साथ साथ भाजपा का भय सामने आ गया था। आनन फानन में गृह मंत्रालय ने उसे अपने अधीन होने की नई सूचना जारी कर आप सरकार का यह काम बंद करा दिया था।

इसलिए साफ है कि भाजपा के पार्षदों का हंगामा करना उस भय का परिचायक है जो गड़े मुर्दे उखाड़े जाने का है। पंद्रह साल के लगातार शासन में भाजपा अगर दिल्ली के लिए कुछ बेहतर नहीं कर पायी तो अब यह तरीका आजमा रही है। जिसका मकसद सिर्फ पूर्व की गड़बड़ियों पर पर्दा डालना है। वरना हर सरकार के बदल जाने के बाद उसके किये धराये कारनामे तो पूरे देश में उजागर होते ही रहते हैं।