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अब सामान्य आरटीपीसीआर टेस्ट को चकमा देने लगे हैं कोरोना वायरस

  • ओमीक्रॉन वेरियंट अब तुरंत पकड़ में नहीं आते

  • संक्रमित व्यक्ति खुद ही खुद को अलग कर ले

  • चंद दिनों के बाद की गयी जांच से ही होगी पुष्टि

राष्ट्रीय खबर

रांचीः पहले कोरोना की दूसरी लहर के दौरान उसकी पहचान जिस आरटीपीसीआर जांच से हो रही थी वह अब लगभग बेकार हो चुका है। लगातार जारी अनुसंधान में यह बात सामने आयी है। यह बताया गया है कि अभी सर्वाधिक फैले ओमिक्रॉन वेरियंट का पता इस जांच से सिर्फ तभी चल सकता है जब वायरस की मात्रा बहुत अधिक हो चुकी हो।

वरना संक्रमण की चपेट में आने के बाद जांच कराने का निष्कर्ष नेगेटिव यानी कोरोना मुक्त ही निकल रहा है। इसलिए वायरस विशेषज्ञों ने दुनिया भर के लोगों को इस बारे में आगाह किया है। साथ ही बचाव की तरकीबें भी बतायी हैं। पहले जिस विधि से कोरोना वायरस को पकड़ा जा रहा था अब वह विधि नये वेरियंट को नहीं पकड़ पा रही है। जांच दल ने संक्रमण होने की आशंका होने पर उस संक्रमण को और फैलने से रोकने के लिए लोगों को खुद ही भीड़ से तीन दिनों के लिए अलग कर लेने की हिदायत दी है।

इस आरटीपीसीआर विधि की जांच से कोरोना नेगेटिव पाये गये मरीजों में बाद में कोरोना संक्रमण होने की लगातार सूचना के बाद इस तरफ वायरस विशेषज्ञों का ध्यान आकृष्ट हुआ था। वैज्ञानिकों ने बारिकी से इस बात की जांच की और पाया कि अत्यधिक संक्रमण की स्थिति में नहीं होने तक अब यह जांच विधि कारगर नहीं हो रही है।

ऐसा खास तौर पर कोरोना वायरस के नये वेरियंट ओमीक्रॉन में पाया गया है। इस विधि को वैज्ञानिकों ने पूरी तरह खारिज तो नहीं किया है लेकिन कहा है कि सिर्फ एक जांच के बदले कई दिनों तक लगातार जांच से ही यह जांच विधि कोरोना संक्रमण को पकड़ पा रही है। सामान्य किस्म के संक्रमण के चिह्न इस जांच में अब नहीं पकड़ में आ रहे हैं। कोरोना जांच कराने के बाद नेगेटिव रिपोर्ट आने से निश्चिंत लोगों को यह पता भी नहीं चल पाता कि उनके अंदर कोरोना के विषाणु पनप रहे हैं। इस जानकारी के अभाव में वे दूसरों तक इस संक्रमण को फैलाते चले जाते हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ साउर्न कैरोलिना के सूसान बटलर वू ने कहा कि अगर किसी को अपने कोरोना संक्रमित होने का अंदेशा हो तो उसे वायरस की संख्या बढ़ने के बाद ही जांच करानी चाहिए। संक्रमण का खतरा महसूस होते ही जांच कराने पर रिपोर्ट हमेशा नेगेटिव ही आयेगी। ओमीक्रॉन वेरियंटों को शरीर के अंदर पनपने और फैलने में वक्त लगता है।

इसलिए अगर संक्रमण का अंदेशा हो तो दो अथवा तीन दिन बाद आरटीपीसीआर विधि की जांच से इसका पता चल पायेगा। अब तो इस जांच को पांच दिन के बाद कराने की हिदायत दी गयी है ताकि इस बीच कोरोना के विषाणु पर्याप्त मात्रा में होने की वजह से जांच में पकड़े जा सकें।

दरअसल कोरोना वायरस के स्वरुप में आये बदलाव की वजह से ऐसा हो रहा है। इस नये वेरियंट की चपेट में आने वाले को खांसी, सुस्ती और नाक का बहना संक्रमण का संकेत हो सकता है। इसलिए शोध दल ने कहा है कि अगर ऐसे संकेत मिले तो संबंधित व्यक्ति को दूसरों से तुरंत अलग कर लेने के बाद कमसे कम तीन दिन का इंतजार करना चाहिए।

शोध दल ने साफ किया है कि चूंकि दुनिया की अधिकांश आबादी को वैक्सिन लग चुका है और अनेक स्थानों पर बुस्टर डोज भी लगे हुए हैं। इस वजह से भी लोगों को कोरोना की पहले जैसी परेशानी नहीं हो रही है। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि कोरोना पूरी तरह खत्म हो गया है अथवा नियंत्रित अवस्था में है।

वायरस विशेषज्ञों के मुताबिक अगर इस वायरस ने फिर से कोई नया और खतरनाक स्वरुप धारण किया तो पूरी दुनिया को फिर से कोरोना की तबाही आने से नहीं रोका जा सकता है। इसी क्रम में बताया गया है कि कोरोना के नये वेरियंट पहले की तुलना में अधिक तेजी से फैलते हैं। सुक्ष्म स्थिति में भी कोरोना के विषाणुओं की पहचान करने में सक्षम मॉलिक्यूलर टेस्ट से ही ऐसे सुक्ष्म संक्रमणों का पता चल पाता है। यह विधि अभी आम जनता के लिए उपलब्ध नहीं है।