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रीढ़ की चोट को ठीक करने की नई विधि विकसित

  • जैविक पदार्थ बनाकर किया है यह काम

  • यह क्षतिग्रस्त इलाके को सक्रिय बनाता है

  • अन्य कोशों को संकेत भेजकर चालू करता है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः रीढ़ की चोट कई बार अत्यंत घातक होती है। इस संवेदनशील हिस्से पर चोट लगने से इंसान का दिमाग से पूरे शरीर का तालमेल खत्म हो जाता है। कई बार इसी वजह से घायल होने वाले पूरी तरह अपाहिज भी हो जाता है। अब वैज्ञानिकों ने ऐसी चोट का ईलाज खोज लिया है। इस विधि में क्षतिग्रस्त इलाके में मौजूद कोषों की मरम्मत होती थी। इसके बाद वहां नये सिरे से कोषों के बनने की प्रक्रिया फिर से प्रारंभ हो जाती है। यानी इस विधि से रीढ़ पर लगने वाली चोटों में से बहुतों का स्थायी ईलाज अब किया जा सकता है।

इस विधि के बारे में शोध दल ने अपनी रिपोर्ट बॉयोमैटेरियल रिसर्च नामक पत्रिका में प्रकाशित की है। जिसमें इसके तकनीकी पहलुओं का विस्तार से जानकारी दी गयी है। आम आदमी की समझ में कहें तो इस किस्म के अनेक चोटों से बिस्तर पर पड़ा आदमी भी पूरी तरह ठीक होकर चल फिर सकता है क्योंकि इस विधि से उसकी रीढ़ पहले जैसी हो जाती है।

इस काम को अंजाम देने के लिए शोध दल ने खास किस्म का बॉयो मैटेरियल यानी जैविक पदार्थ तैयार किया है। इन्हें नैनो पार्टिकल के स्तर पर बनाया गया है। यह क्षतिग्रस्त इलाके तक पहुंचकर अपना काम करने लगते हैं। यह भी जेनेटिक इंजीनियरिंग का एक नया उदाहरण है। आयरलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ लीमेरिक में यह काम किया गया है।

इसके परीक्षण के नतीजे उत्साहजनक पाये गये हैं। इसमें टिशू इंजीनियरिंग विधि के अंदर गया जैविक पदार्थ खुद ही यह काम करने लगता है। इस शोध दल के नेता प्रोफसर मॉरिस एन कॉलिंस थे। इस दल ने एक पदार्थ को खास किस्म के बिजली सुचालक पॉलिमर की मदद से तैयार किया है। अधिकांश बड़ी दुर्घटनाओं में रीढ़ पर अधिक चोट लगने की वजह से इंसान कई किस्म की परेशानियों से घिर जाता है। अब यह नई विधि उनमें से अधिकांश परेशानियों को दूर कर संबंधित मरीज को अपने पैरों पर खड़े होने की ताकत प्रदान करेगी। दरअसल  मरीजों के लिए टिश्यू दान में  मिलने वाली दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए इसे तैयार किया गया है ताकि मरीज किसी दूसरे पर आश्रित नहीं रहे।

प्रोफसर कॉलिंस ने बताया कि इस किस्म की चोट का सबसे अधिक नुकसान यह होता है कि शरीर में बिजली तरंगों की व्यवस्था बाधित हो जाती है। कई स्थानों पर कोषों के क्षतिग्रस्त होने की वजह से ऐसा होता है और इस चोट के इलाके के कोष खुद को फिर से विकसित नहीं कर पाते हैं क्योंकि उन्हें दिमाग से ऐसा करने का संकेत नहीं मिल पाता है।

इस नये जैविक पदार्थ को तैयार करने में जिन पदार्थों का इस्तेमाल किया गया है वे बाजार में पहले से उपलब्ध हैं। खासकर कॉर्बन नैनो ट्यूब अब कोई अजूबा नहीं रहे। पहले ऐसे पदार्थों का इस काम में इस्तेमाल किया जाता था, जो स्वाभाविक तौर पर घुलकर समाप्त नहीं होते थे। इस बार उस परेशानी को भी दूर कर लिया गया है। क्षतिग्रस्त स्थान पर पहुंचने के  बाद यह पदार्थ टिश्यू बनाने का काम प्रारंभ करता है और उससे मिलने वाले संकेतों के आधार पर आस पास के इलाके की कोशिकाएं भी अपने काम में लग जाती है। इससे मरीज के रीढ़ की चोट ठीक होने लगती है।