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युद्धविराम के लिए जेलेंस्की की ना के बाद भी भारत का प्रयास जारी

  1. सस्ता तेल पर बैठक की सूचना सार्वजनिक

  2. भारत की कूटनीतिक सत्यता पर भरोसा

  3. प्रयास से कोई रास्ता निकल भी सकता है

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर रूस पहुंचे हैं। वहां के विदेश मंत्री सेरेगेई लावारोव और उप प्रधानमंत्री दानिस मांतुरोव के साथ उनकी मुलाकात औपचारिक तौर पर तेल की आपूर्ति से संबंधित है। दूसरी तरफ अंदरखाने से यह सूचना आ रही है कि इस मुलाकात में फिर से युद्धविराम का कोई रास्ता निकालने का भारतीय प्रस्ताव भी दिया जाएगा।

ऐसा तब हो रहा है जबकि यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साफ तौर पर इससे इंकार कर दिया है। जेलेंस्की ने श्री मोदी के प्रस्ताव को यह कहकर ना कर दिया था कि रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन जानबूझकर कूटनीतिक समाधान का रास्ता बंद कर चुके हैं। इस इंकार के बाद भी भारत वहां शांति लाने के अपने प्रयास जारी रखे हुए हैं क्योंकि यह सत्य है कि ऐसे युद्ध का असर सिर्फ वार्ता से ही समाप्त किया जा सकता है।

रूस ने इस युद्ध के दौरान भारत को ईंधन की आपूर्ति की है। रूस से मिल रहे सस्ते तेल की वजह से भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर विदेशी मुद्रा का उतना दबाव नहीं पड़ा है जितना दूसरे देश झेल रहे हैं। इसलिए दोनों देशों की कूटनीतिक बैठक में इंधन की आपूर्ति पर चर्चा होने की खबर दी गयी है। दूसरी तरफ यूक्रेन के साथ भारत का रिश्ता पहले से ही बहुत अच्छा नहीं रहा है। दूसरी तरफ रूस ने अपने संकटों के दौरान भारत का मजबूती से साथ दिया है।

इस वजह से यूक्रेन के इंकार के बाद भी भारतीय पक्ष वहां युद्ध समाप्त करने के अपने प्रयासों को छोड़ना नहीं चाहता है। अंदरखाने से मिल रही सूचनाओँ के मुताबिक यूक्रेन के राष्ट्रपति के इंकार के बाद भी भारत अपनी सोच पर कायम है और वहां जारी युद्ध के नुकसान के साथ साथ आम आदमी को राहत दिलाने के अपने प्रयास जारी रखे हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक ऐसे मुद्दों पर कूटनीतिक स्तर पर भारत की सच्चाई पर किसी को अविश्वास नहीं होता है क्योंकि यह भारत ने लंबे समय के प्रयासों से अर्जित किया है।

लिहाजा अगर जेलेंस्की ने इंकार कर भी दिया है तो रूस से इस दिशा में पहल करने का अनुरोध करना कोई गलत बात नहीं है। संभव है कि इस वार्ता से समस्या के समाधान का कोई रास्ता निकल आये। इसके पहले कई देशों ने मध्यस्थता करने की पहल की थी लेकिन पुतिन ने किसी भी प्रस्ताव को गंभीरता से नहीं लिया। सिर्फ अपने मित्र और तुर्की के राष्ट्रपति एर्देगॉन की पहल पर उन्होंने यूक्रेन से अनाज निर्यात के अस्थायी शांति मार्ग को स्वीकार किया है।