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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम मानवीय गरिमा

आज के डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में इंटरनेट सेंसेशन बनने की होड़ हर तरफ दिखाई देती है। हर व्यक्ति अपने कंटेंट को रातोंरात वायरल करने और लाइक्स-व्यूज हासिल करने की अंधी दौड़ में शामिल है। इसी होड़ के बीच, हास्य और व्यंग्य की आड़ में अक्सर नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं की सीमाओं को लांघ दिया जाता है।

हाल ही में, समय रैना सहित पांच प्रमुख सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के कंटेंट से जुड़ा एक मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया, जिसमें उनकी टिप्पणियों को दिव्यांगों की गरिमा के खिलाफ पाया गया। इस मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत द्वारा की गई सख्त टिप्पणियां केवल एक विशेष मुकदमे तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह हमारे समाज और डिजिटल स्पेस के लिए एक गंभीर आत्मविश्लेषण का विषय हैं। लोकतांत्रिक देशों में संविधान ने अपने नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया है, ताकि वे अपने विचार खुलकर रख सकें।

हालांकि, यह समझना बेहद आवश्यक है कि कोई भी अधिकार अपने साथ असीमित छूट लेकर नहीं आता; हर अधिकार के साथ सामाजिक दायित्व और जवाबदेही जुड़ी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बिल्कुल सटीक रुख अपनाते हुए यह स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को दूसरों की कीमत पर हंसने या उनका उपहास उड़ाने की छूट नहीं दी जा सकती।

विशेष रूप से दिव्यांगों, बीमारों और समाज के अन्य कमजोर या हाशिए पर मौजूद तबकों को निशाना बनाकर हास्य पैदा करना न केवल अमानवीय है, बल्कि यह उनकी गरिमा के भी खिलाफ है। अदालत ने यह भी एक बहुत ही तर्कसंगत मानक स्थापित किया है कि यदि कोई व्यक्ति या क्रिएटर इस तरह के कृत्यों के लिए प्रायश्चितस्वरूप क्षतिपूर्ति देता है, तो उसकी राशि उस व्यक्ति या वर्ग को हुए मानसिक और सामाजिक नुकसान के मुकाबले काफी अधिक होनी चाहिए, ताकि यह समाज में एक कड़ा संदेश दे सके।

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि क्या सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर परोसे जाने वाले कंटेंट को विनियमित करने के लिए सरकार की ओर से कोई ठोस और स्पष्ट गाइडलाइन होनी चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज के समय में इस तरह के नियमों की सख्त जरूरत है।

इस संबंध में अटॉर्नी जनरल की ओर से अदालत को यह जानकारी दी गई कि सभी संबंधित हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) के साथ चर्चा की प्रक्रिया पहले ही शुरू की जा चुकी है। तथापि, सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर मुहर लगाई है कि इस तरह की कोई भी गाइडलाइन किसी एक विशेष या तात्कालिक घटना की प्रतिक्रिया में आनन-फानन में तैयार नहीं की जानी चाहिए।

नीति निर्माण की यह प्रक्रिया काफी व्यापक होनी चाहिए। इस कार्य को न केवल वर्तमान परिस्थितियों और उससे जुड़े तमाम तकनीकी व सामाजिक पहलुओं को ध्यान में रखकर अंजाम दिया जाना चाहिए, बल्कि आने वाले दौर की डिजिटल चुनौतियों का भी पूरा आकलन किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की इस महत्वपूर्ण टिप्पणी से एक और बड़ा वैधानिक सवाल खड़ा होता है कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यापारिक और गैर-व्यावसायिक जैसी दो अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर देखा जा सकता है?

यह ध्यान रखना होगा कि भारतीय संविधान ने देश के सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति का एक समान अधिकार दिया है। इसके साथ जुड़ी पाबंदियां और सीमाएं भी हर नागरिक के लिए समान रूप से लागू होती हैं। यहां तक कि पारंपरिक मीडिया या मीडियाकर्मियों को भी संविधान के तहत कोई विशेष या अलग से विशेषाधिकार नहीं दिए गए हैं।

ऐसे में यह विचारणीय प्रश्न है कि क्या सोशल मीडिया पर पैसे कमाने या विज्ञापन के जरिए मुनाफा कमाने वाले कमर्शियल कंटेंट की अभिव्यक्ति को अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए? जब कोई व्यक्ति अपने कंटेंट का मोनेटाइजेशन करता है, तो उसकी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। पिछली सुनवाई और इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं को यदि गहराई से परखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह पूरा मामला मुख्य रूप से दो मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन साधने का है—पहला, संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रदत्त वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार और दूसरा, अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार।

एक तरफ जहां किसी भी नागरिक की रचनात्मकता और विचारों को दबाया नहीं जा सकता, वहीं दूसरी तरफ किसी अन्य व्यक्ति के आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा को भी ठेस पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले समय में शीर्ष अदालत इन दोनों मूलभूत अधिकारों के बीच एक न्यायसंगत और व्यावहारिक संतुलन कैसे कायम करती है।