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विनोवा भावे यूनिवर्सिटी की 1 लाख कॉपियों की जांच में बड़ा फर्जीवाड़ा

बिना आदेश के हो रहा है सारा काम

कॉपी जांचने का तीस लाख कौन देगा पता नहीं

कॉलेज प्रबंधन ने भी जानकारी से कर दिया इंकार

पूरे प्रबंधन तंत्र पर हावी है एक गेस्ट फैकल्टी

रांची: हजारीबाग स्थित विनोवा भावे विश्वविद्यालय की उत्तर पुस्तिकाओं (कॉपियों) के मूल्यांकन में एक बड़ा और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। विश्वविद्यालय की एक लाख से अधिक कॉपियों को जांच के नाम पर एक अल्पसंख्यक कॉलेज में भेज दिया गया है, जबकि कॉलेज प्रबंधन इससे पूरी तरह से इंकार कर रहा है। हैरानी की बात यह है कि बिना किसी लिखित या औपचारिक आदेश के प्रोफेसर और गेस्ट फैकल्टी इन कॉपियों की जांच कर रहे हैं, और करीब पचास हजार कॉपियां आज भी कॉलेज के उपेक्षित स्टोर रूम में धूल फांक रही हैं।

शिक्षा जगत के जानकारों का कहना है कि विश्वविद्यालय के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब सेमेस्टर की कॉपियों को स्थानीय स्तर के बजाय इस तरह बाहर भेजा गया हो। जानकारों के मुताबिक, यदि कॉपियों को बाहर भेजना भी पड़े, तो नियमतः उन्हें एक विश्वविद्यालय से दूसरे विश्वविद्यालय भेजा जाता है, लेकिन इस मामले में नियमों की पूरी तरह धज्जियां उड़ाई गई हैं।

इस पूरे खेल के केंद्र में योगदा कॉलेज के एक गेस्ट फैकल्टी विद्यासागर का नाम सामने आ रहा है। चर्चा है कि उन्होंने विनोवा भावे यूनिवर्सिटी से ही अपनी पढ़ाई और पीएचडी पूरी की है, और जिस गाइड के मार्गदर्शन में उन्होंने पीएचडी की थी, वर्तमान में वही शख्स उसी यूनिवर्सिटी में परीक्षा नियंत्रक के पद पर तैनात हैं।

चूंकि कॉपियों को कॉलेज के स्टोर रूम में रखकर या घरों पर जांचा जा रहा है, इसलिए मूल्यांकन की पारदर्शिता और शुचिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आशंका जताई जा रही है कि क्या चुनिंदा उत्तर पुस्तिकाओं को घर ले जाकर लिखवाया या सुधारा तो नहीं जा रहा है।

इसके अलावा, सबसे बड़ा झोल वित्तीय अनियमितता को लेकर है। सामान्य नियम के तहत प्रति कॉपी जांचने के लिए 20 रुपये (रांची के अन्य कॉलेजों में 15 रुपये) का भुगतान किया जाता है। इस हिसाब से करीब एक लाख कॉपियों के मूल्यांकन के लिए लगभग 30 लाख रुपये का भुगतान किया जाना है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया और भुगतान के तौर-तरीकों को पूरी तरह गोल कर दिया गया है। विवाद बढ़ने के बाद अब यह भी संदेह के घेरे में है कि इन अवैध तरीके से कॉपियों की जांच करने वालों को भुगतान मिलेगा भी या नहीं। कॉलेज प्रबंधन द्वारा जानकारी से इनकार करने और पर्दे के पीछे चल रहे इन तमाम खेलों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।